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इमरजेंसी दवाओं से भी महरूम अस्पताल

आयुर्वेदिक अस्पतालों की बदहाली दूर करने की बजाय शासन ने उन्हें बंद करने का फैसला तो कर लिया। लेकिन बदहाली के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है। इन अस्पतालों में इमरजेंसी दवाओं का पूरी तरह से टोटा है। फौरी इलाज के अभाव में रोगी आयुर्वेदिक अस्पतालों में फटकते। दवाओं के नाम पर चूर्ण सप्लाई किए जा रहे हैं।


गाजियाबाद में आयुर्वेद और यूनानी के तीन अस्पताल और तीन डिस्पेंसरी बनी हुई है। कहने के लिए तीन बड़े अस्पतालों में 15 से 25 बिस्तर तक है। लेकिन अस्पतालों की हालत बहुत खराब है। गाइड लाइन में इन आयुर्वेदिक अस्पतालों में इमरजेंसी रोगियों को भी भर्ती करने की सुविधा है। पर इमरजेंसी के लायक दवाएं अस्पतालों को मिलती ही नहीं। अस्पतालों का सालाना बजट भी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ऐलोपैथ के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को सालाना लाखों रुपए का बजट जारी होता है। पर एक आयुर्वेदिक औषधालय को सालाना केवल छह हजार रुपए दवाओं के नाम पर मिलते हैं।

इसमें भी इमरजेंसी दवाओं को छोड़कर विभिन्न प्रकार के चूर्ण की सप्लाई की जाती है। फौरी तौर पर इलाज नहीं मिलने से रोगी भी इन अस्पतालों से किनारा कर लेते हैं। क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी डॉ. यशपाल सिंह का कहना है कि प्रदेश में सभी आयुर्वेदिक अस्पतालों की यही हालत है।

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