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चार धाम यात्रा अब अपने ढलान पर

उत्तराखंड मे चार धाम तीर्थयात्रा के रूप में विख्यात यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा अब अपने अंतिम पडाव पर पहुंच चुकी है। तीन धामों में यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ के कपाट बंद हो चुके हैं जबकि चौथे धाम बद्रीनाथ के कपाट बंद कर दिये जायेंगे। इस दौरान देश विदेश से करीब 30 लाख यात्रियों ने चारों धाम की यात्रा की।

उत्तराखंड में लाखों की संख्या मे प्रतिवर्ष आने वाले तीर्थयात्री न केवल चार धाम की यात्रा करते हैं बल्कि हजारों की संख्या मे अन्य तीर्थयात्री पंच केदारों में मदमहेश्वर, तुंगनाथ, रूद्रनाथ और कल्पेश्वर महादेव की भी यात्रा करते हैं। इसके अतिरिक्त यात्रियों की अच्छी खासी संख्या पंच बद्री और पंच प्रयाग का भी दर्शन करती है।

बद्रीनाथ केदारनाथ समिति के अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट्ट ने बताया कि अब तक करीब 30 लाख यात्रियों ने चारों धाम और पंचकेदार, पंचबद्री और पंच प्रयाग के दर्शन किए। भट्ट के अनुसार तीन धाम के कपाट शीतकाल के लिये बंद हो चुके हैं लेकिन विख्यात बद्रीनाथ के कपाट आज बंद होंगे।

उत्तराखंड के चमोली मे करीब 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित चतुर्थ केदार के रूप मे स्थापित भगवान रूद्रनाथ मंदिर के कपाट शीतकाल के लिये सबसे पहले गत दीपावली के दिन विधि विधान से बंद कर दिये गए थे। भगवान की डोली को गोपेश्वर स्थित गोपीनाथ मंदिर में छह महीने के लिये रखा गया है जहां उनकी पूजा की जायेगी। पंचकेदार के तहत रूद्रनाथ मंदिर के कपाट सबसे पहले शीतकाल के लिये दीपावली के दिन बंद कर दिये गये थे।

यमुनोत्री और केदारनाथ के कपाट दीपावली के तीसरे दिन यमद्वितीया के दिन बंद किए गए जबकि गंगोत्री के कपाट दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के दिन पूरे विधि विधान से बंद किये गए थे।

चार धाम विकास परिषद के उपाध्यक्ष सूरत राम नौटियाल ने बताया कि चारों धाम के कपाट बंद होने की तैयारी पहले से ही शुरू कर दी गई थी और इसके लिए विशेष अनुष्ठान तथा पूजा भी की जाती है।

उन्होंने बताया कि गंगोत्री के कपाट धार्मिक अनुष्ठान और वैदिक मंत्रों के बीच बंद कर दिये जाने के बाद गंगोत्री मां की डोली मुख्वा मारकण्डेय मंदिर में शीतकाल के दौरान करीब छह महीने के लिए भेज दी गई है।

केदारनाथ की गद्दी उखीमठ में धर्माचार्यों ने गत दिनों मुहुर्त निकालकर केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद करने की तिथि निर्धारित की थी। केदारनाथ की गद्दी छह महीने के लिये उंकालेश्वर मंदिर मे रखी गई है।

धर्माचार्यों ने द्वितीय केदार के रूप मे स्थापित मदमहेश्वर के कपाट को 20 नवंबर को बंद करने का मुहुर्त निकाला है जबकि तृतीय केदार के रूप मे स्थापित तुंगनाथ के कपाट 26 नवंबर को बंद करने की घोषणा की गई है। परम्परा के अनुसार मदमहेश्वर की गद्दी भी कालेश्वर मंदिर लाई जायेगी जबकि तुंगनाथ की गद्दी मक्कूमठ स्थित मंदिर मे स्थापित की जायेगी। नौटियाल ने बताया कि पंचम केदार के रूप में स्थापित कल्पेश्वर महादेव की गद्दी अपने ही स्थान पर बारहों महीने विराजित रहती है।

भट्ट ने बताया कि मुहूर्त के अनुसार बद्रीनाथ के कपाट आज अपराहन तीन बजकर चालीस मिनट पर बंद किए जा रहे हैं। मंदिर के कपाट बंद करने के लिये धार्मिक रीति रिवाज शुरू कर दिये हैं। पूरे मंदिर प्रांगण की सफाई और यज्ञ हवन भी किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि कल सबसे पहले विधि विधान से गणेश जी और उंकालेश्वर के मंदिरों को बंद किया गया और आज गर्भगह में स्थित उद्धव जी की मूर्ति को मुख्य पुजारी रावल जी बाहर लेकर आये। भट्ट ने बताया कि उद्धव जी की मूर्ति को बाहर निकालकर डोली मे रखे जाने के बाद रावल जी स्त्री वेश में लक्ष्मी जी की मूर्ति को अंदर गर्भगह में ले जाकर रखेंगे।

आमतौर पर ग्रीष्मकाल के दौरान लक्ष्मी जी की मूर्ति मंदिर के बाहर ही रहती है क्योंकि इस दौरान भगवान बद्री के निकटतम मित्र उद्धव जी उनके साथ रहते हैं इसलिये लक्ष्मी जी की केवल प्रतीक मूर्ति ही अंदर रहती है और मुख्य मूर्ति बाहर अलग मंदिर में रहती है ।

उन्होंने बताया कि जब मंदिर शीतकाल के लिये बंद किया जाता है तो उद्धव की मूर्ति को उत्सव डोली के साथ पांडुकेश्वर लाया जाता है और बद्रीनाथ जी की मूर्ति को जोशीमठ नरसिंह मंदिर मे विराजित कराया जाता है जहां उनकी शीतकाल के दौरान छह महीने के लिये पूजा की जाती है।

भट्ट ने बताया कि उद्धव जी की मूर्ति को पांडुकेश्वर में स्थापित करने के बाद भगवान बद्री की मूर्ति को पूरे विधि विधान के साथ एक विशाल जुलूस में जोशीमठ लाकर रखा जायेगा।

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