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सिनेमा के जरिए कला का सौंदर्यबोध कराया वी शांताराम ने

सिनेमा के जरिए कला का सौंदर्यबोध कराया वी शांताराम ने

हिन्दी फिल्म कला में कई नए आयाम जोड़ने वाले महान फिल्मकार वी शांताराम ने युवा फिल्मकारों में सिनेमा के जरिए नृत्य, संगीत और चित्रों में सौंदर्यबोध की लौ जलाई। हिन्दी फिल्म जगत के दूसरे शो मैन सुभाष घई की नजर में शांताराम एक ऐसे महान फिल्मकार थे, जिन्होंने संगीत, नृत्य और अपने अद्भुत अंदाज से कहानियों को पर्दे पर जीवंत करने की अनोखी कोशिश को अंजाम दिया।

वर्ष 1921 में सुरेखा हरण नामक मूक फिल्म से बतौर अभिनेता अपने सफर की शुरुआत करने वाले शांताराम बाद में फिल्म निर्देशन से जुड़ गए और उन्होंने करीब छह दशक तक सिनेमा जगत में योगदान किया। शांताराम ने संवेदनशीलता से परिपूर्ण फिल्मों का दौर शुरू किया था और घई के मुताबिक उनकी सोच और नजरिए की झलक आज के दौर के निर्देशकों के अंदाज में भी नजर आती है।

घई ने बातचीत में शांताराम की शख्सियत और उनकी विरासत के बारे में कहा कि महान लोग अमर हो जाते हैं और उनका काम अगली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करता रहता है। शांताराम की दृष्टि आज के दौर के कुछ निर्देशकों में नजर आती है। आशुतोष गोवारीकर और संजय लीला भंसाली की फिल्मकारी में शांताराम के अंदाज की झलक मिलती है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 18 नवंबर, 1901 को एक जैन परिवार में जन्मे राजाराम वांकुडरे शांताराम ने बाबूराव पेंटर की महाराष्ट्र फिल्म कम्पनी में छोटे-मोटे काम से अपनी शुरुआत की थी। शांताराम का शुमार ऐसे पहले फिल्मकारों में किया जाता है, जिन्होंने फिल्मों की सामाजिक परिवर्तन के माध्यम के रूप में क्षमताओं को पहचाना। उन्होंने इस पर अमल करते हुए अपनी फिल्मों में मानवता की अहमियत की वकालत की और समाज में फैली बुराइयों को भी उधेड़ा।

घई के मुताबिक शांताराम की फिल्मों में रंगमंच का पुट जरूर ज्यादा नजर आता था लेकिन वह अपनी फिल्मों से समाज को एक नई दृष्टि देने में कामयाब रहे। घई मानते हैं कि हर फिल्म अपने वक्त की कहानी बयान करती है लेकिन उन्हें लगता है कि अब शांताराम की पड़ोसी (1940) और दो आंखें बारह हाथ जैसी जीवंत फिल्में दोबारा नहीं बनाई जा सकतीं।

घई ने कहा कि हालांकि नए जमाने के फिल्मकार तकनीक के लिहाज से कहीं ज्यादा साधन सम्पन्न हैं लेकिन शांताराम की कुछ कृतियों की गुणवत्ता का मुकाबला आज भी नहीं किया जा सकता।

वर्ष 1927 में नेताजी पालकर बनाकर बतौर निर्देशक शुरुआत करने वाले शांताराम ने डॉक्टर कोटनिस की अमर कहानी (1946), अमर भूपाली (1951), झनक-झनक पायल बाजे (1955), दो आंखें बारह हाथ (1957) और नवरंग (1959) जैसी विविधतापूर्ण और गूढ़ अर्थों वाली फिल्में बनाकर अलग मुकाम हासिल किया था।

शांताराम एक चलते-फिरते संस्थान थे जिन्होंने फिल्म जगत में बहुत सम्मान हासिल किया। फिल्म निर्माण की उनकी तकनीक और उनके जैसी दृष्टि आज के निर्देशकों में कम ही नजर आती है। उन्हें वर्ष 1957 में झनक-झनक पायल बाजे के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया था। अगले ही साल उनकी कालजयी फिल्म दो आंखें बारह हाथ के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार प्रदान किया गया। इस फिल्म ने बर्लिन फिल्म समारोह और गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड में भी झंडे गाड़े।

अन्नासाहब के नाम से मशहूर शांताराम को वर्ष 1985 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। फिल्म जगत में अमूल्य योगदान करने वाले शांताराम ने 30 अक्टूबर 1990 को दुनिया को अलविदा कह दिया।

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