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आंध्र प्रदेश: जब दिल्ली आए रोसैया

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कोनिजेती रोसैया की यह पहली दिल्ली यात्रा थी। ऊपरी तौर पर यह बाढ़ राहत कामों की तीव्र मदद हासिल करने के लिए किया गया एक सरकारी दौरा था। लेकिन हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी के मामलों को निपटाने के लिए हफ्ते के अंत का समय चुना था। संभवत: वे कांग्रेस पार्टी के अकेले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने पार्टी अध्यक्ष से मिलने और उन्हें धन्यवाद देने में दो महीने लगा दिए। लेकिन जिन हालात में उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला उसमें देरी होना स्वाभाविक था। दरअसल रोसैया ने सचिवालय के मुख्यमंत्री चैंबर में शपथ लेने के एक महीने बाद बैठना शुरू किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी की विमान दुर्घटना में मौत के बाद उन्हें यह कार्यभार सौंपा गया था। इस एक महीने तक यह अभियान चलाया जाता रहा कि पिता के निधन के बाद वह पद उनके बेटे वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी को सौंप दिया जाए।

मुख्यमंत्री के कक्ष में जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि उन्हें कांग्रेस हाईकमान का समर्थन प्राप्त है। हालांकि इसी के साथ यह धारणा कायम रही कि पिछली सरकार के कुछ प्रभावी लोग सरकार की निर्णय प्रक्रिया को अभी भी प्रभावित कर रहे हैं। रोसैया की निर्णायक क्षमता की कार्रवाई को दो बातों ने प्रभावित किया। एक तो यह कि पिछले सौ साल में आई सबसे भयंकर बाढ़ ने राज्य के चार जिलों को बुरी तरह से डुबो रखा था, जबकि राज्य के 20 जिले सूखे की चपेट में हैं। दूसरी बात यह है कि उनके मुख्यमंत्री बनने पर कांग्रेस विधायक दल की मुहर नहीं लगी थी। वास्तव में वे अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग तभी कर पाए, जब सोनिया गांधी ने जगनमोहन रेड्डी से मुलाकात की और उन्होंने अपने समर्थकों को नियंत्रित करने का भरोसा दिया। जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाए जाने का अभियान जबरदस्त था। यहां तक कि उनके मंत्रिमंडल के सदस्य भी यह मांग कर रहे थे।

इसके बावजूद अगर उन्होंने राज्य के सूखा और बाढ़ जैसे दो बड़े संकटों के निपटने में अपनी दक्षता का परिचय दे कर रोसैया ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में सम्मान हासिल कर लिया, तो यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। लेकिन इससे कांग्रेस हाईकमान संतुष्ट नहीं है। वह चाहता है कि आंध्र का यह अनुभवी नेता अपने मंत्रिमंडल, कांग्रेस विधायक दल के असंतोष और जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने की प्रायोजित रट को सफलतापूर्वक समाप्त करे। जब रौसैया अपने मंत्रिमंडल के आधे सदस्यों के साथ दिल्ली आए तो उन्होंने यह संदेश देना चाहा कि आंध्र प्रदेश की हवा बदल रही है। उनके साथ आने वालों में वे मंत्री भी थे, जिन्होंने कसम खाई थी कि वे जगनमोहन रेड्डी के अलावा किसी अन्य मुख्यमंत्री के साथ काम नहीं करेंगे। वाईएसआर मंत्रिमंडल में महिला कल्याण मंत्री के रूप में काम करने वाली कोंडा सुरेखा जो जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने वाले अभियान की अगुआ थीं, उन्होंने हाल में अपना इस्तीफा सौंप दिया है। रोसैया ने बिना विलंब किए उनका इस्तीफा मंजूर कर राज्यपाल के पास भेज दिया है। इससे जगनमोहन के तमाम समर्थक हिल गए और वे आजकल न सिर्फ नया राग अलाप रहे हैं, बल्कि रोसैया पर तारीफ के फूल बरसा रहे हैं।

दिल्ली के इस संदेश का भी काफी असर रहा है कि रोसैया अपना मंत्रिमंडल पुनर्गठित करने के लिए स्वतंत्र होंगे। यहां तक कि केवीपी रामचंद्र राव भी रक्षात्मक बयान देते हुए कह रहे हैं कि जब सभी मंत्रियों ने रोसैया के नेतृत्व में दोबारा शपथ ली है तो इसका मतलब यही है कि वे उन्हें नेता मान रहे हैं। पार्टी हाई कमान से भी रोसैया को सकारात्मक संकेत मिले हैं। यह भी स्पष्ट हो गया कि जगनमोहन रेड्डी निकट भविष्य में राज्य की राजनीति में महत्व नहीं पाएंगे। पूरी तरह से पीछे कर दिए गए जगनमोहन की

उम्मीदें अब दिल्ली के मंत्रिमंडल विस्तार पर टिकी हैं। हो सकता है वहां उन्हें मंत्री का पद मिल जाए। इस लिहाज से रोसैया पर भारी जिम्मेदारियां आ गई हैं। उन्हें सिर्फ पार्टी के प्रशासनिक ढांचे को ही नहीं कुशलता पूर्वक चलाना है, बल्कि पार्टी को राज्य में बढ़ती ताकत के तौर पर उभारना है।

ऐसा करने के लिए उन्हें कांग्रेस विधायक दल का विश्वास भी जीतना होगा। कांग्रेस चाहती है कि यह तकनीकी काम जल्दी ही हो जाए। रोसैया के नेतृत्व पर वाईएसआर-जगन के समर्थकों की छाया तो बनी रह सकती है, साथ ही ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन भी अहम है। क्योंकि वाईएसआर के  करिश्माई नेतृत्व के बिना यह राज्य में होने वाला किसी तरह का पहला चुनाव है। 

radhaviswanath73@yahoo.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

 

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