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संत कुलशेखर आलवार

केरल में एक राजा थे। उन्होंने भगवान नारायण की तपस्या की, ताकि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो। पुत्र पैदा हुआ तो उसका नाम रखा गया ‘कुलशेखर’। उसे भगवान की कौस्तुभमणि का अवतार माना गया। बाल्यावस्था में ही कुलशेखर तमिल और संस्कृत भाषाओं आदि में पारंगत हो गए। इसके साथ ही कुलशेखर ने वेद वेदान्तों का अध्ययन किया और चौसठ कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया। युवावस्था को प्राप्त करते-करते वे

राजनीति, युद्ध विद्या, धनुर्वेद, आयुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा नृत्यकला में भी प्रवीणता प्राप्त की। राजा ने एक दिन उन्हें राजपाट सौंप कर स्वयं भक्ति साधना में लग गए। कुलशेखर ने अपने देश में रामराज्य का अनुरूप राज्य-शासन स्थापित किया। किन्तु वे सदा यही सोचते- ‘वह दिन कब होगा जब ये नेत्र भगवान के त्रिभुवन सुन्दर मंगल विग्रह का दर्शन पाकर कृतार्थ होंगे? मेरा मस्तक भगवान श्रीरंगनाथ के चरणों के सामने कब झुकेगा?’

एक रात भगवान नारायण ने कुलशेखर को स्वप्न में दर्शन दिए। बस उसके बाद से कुलशेखर सब कुछ भूल कर उनकी भक्ति में लीन हो गए। उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। उन्होंने कहा- ‘मुझे इन संसारी लोगों से क्या काम है? मुझे तो भगवान विष्णु के प्रेम में डूब जाना है। मुझे केवल भक्तों का ही संग करना चाहिए।’ इसके बाद एक दिन संत कुलशेखर अपनी भक्त मंडली के साथ कीर्तन-भजन करते तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। तीर्थो की यात्रा की। कई वर्ष श्रीरंगक्षेत्र में बिताए। वहां ‘मुकुन्दमाला’ संस्कृत स्तोत्र-ग्रंथ लिखा। ग्रंथ के एक पद का भाव इस प्रकार है: ‘मुझे न धन चाहिए न शरीर का सुख चाहिए, न मुझे राज्य की कामना है, न मैं इन्द्र का पद चाहता हूं और न मैं सार्वभौम पद चाहता हूं। मेरी तो केवल यही अभिलाषा है कि मैं तुम्हारे मंदिर की एक सीढ़ी बन कर रहूं जिससे तुम्हारे भक्तों के चरण बार-बार मेरे मस्तक पर पड़ें। अथवा हे प्रभो! जिस रास्ते से भक्त लोग तुम्हारे श्रीविग्रह का दर्शन करने के लिए प्रतिदिन जाया करते हैं उस मार्ग का मुझे एक छोटा-सा रजकण ही बना दो।’

 

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  • Web Title:संत कुलशेखर आलवार