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सहमति की खातिर

कोपेनहेगन में अगले महीने प्रस्तावित शिखर वार्ता में ग्लोबल वार्मिग को लेकर काफी गर्मा-गर्मी की तैयारी थी। इसके पहले ही एशिया प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) शिखर वार्ता ने इस गर्मी को काफी ठंडा कर दिया है। कोपेनहेगन वार्ता के अध्यक्ष और डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्स लॉक रासमुसैन और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसे नेताओं ने तय किया है कि कोपेनहेगन में कार्बन उर्त्सजन में कमी के लिए बहुत साफ-साफ पैमाने न तय किए जाएं, यानी इस शिखर वार्ता में छोटी-मोटी सहमति के लिए कोशिश कीजाए और स्पष्ट मानदंडों के सवाल को आगे के लिए टाल दिया जाए। इस प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष दोनों में फर्क है। पक्ष में तर्क यह है कि अगर स्पष्ट मानदंड तय किए जातेहैं तो कोई भी सहमति होना तकरीबन असंभव है और इतने जल्दी ऐसा करनाव्यावहारिक भी नहीं होगा। विपक्ष में तर्क यह है कि अगर सिर्फ सैद्धांतिक सहमति हीहोना है तो उससे कोई भी ठोस नतीजा नहीं निकलेगा। यह सहमति तो अब भी है कि ग्लोबल वार्मिंग रोकी जानी चाहिए और कार्बन उत्सर्जन कम होना चाहिए, लेकिन इससे क्या होता है, हवा-पानी का प्रदूषण बदस्तूर जारी है।
 
समस्या यह है कि न विकसित देश, न विकासशील देश अपने-अपने रवैये तुरंत बदलने का जोखिम ले सकते हैं। विकसित देशों के लिए अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाना मुश्किल है और विकासशील देश अपने विकास की गति नहीं थामना चाहेंगे। कुल जमा कोपेनहेगन शिखर वार्ता के किसी नतीजे पर पहुंचने की उम्मीद यूं भी नहीं थी, ऐसे में अगर यह वार्ता थोड़ी धुंधली ही सही, किसी सहमति पर पहुंचती है तो आगे बढ़ने में सहूलियत होगी। आखिरकार आदमी ने जब से आग का इस्तेमाल सीखा है, तब से आज तक हाइड्रोर्काबन जलाना ही उसके लिए ऊर्जा का सबसे सुविधाजनक साधन रहा है। हम लोग हाइड्रोर्काबन जलाने में थोड़ी किफायत बरत सकते हैं या बेहतर टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन अब जहां दुनिया पहुंच गई है, वहां से किसी बड़े परिवर्तन की तुरंत उम्मीद कम है। एक परिवर्तन पिछले दिनों हुआ है कि वैकल्पिक ऊर्जा स्नोतों की खोज सचमुच गंभीरता से हुई है। हमें यह मान लेना चाहिए कि उम्मीद अब विज्ञान और टेक्नोलॉजी में नई खोजों से ही है, इंसान अपने तौर-तरीके जरा धीरे-धीरे ही बदलता है। यह भी सच है कि तौर-तरीके बदलने के लिए कोशिशें भी इसी हिसाब से की जाएं।

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