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अनार और बीमार

पूरे देश की यह आखिरी आस होती है। बात बिहार के खगड़िया की हो या उत्तर प्रदेश के देवरिया की, पूरे देश में जब भी कोई बीमार होता है और स्थानीय डॉक्टर हाथ खड़े कर देते हैं तो मरीज और उसके परिजन दिल्ली भागते हैं। इस उम्मीद में कि वहां न सिर्फ इलाज हो जाएगा बल्कि अच्छा इलाज हो सकेगा। दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान है, सफदरजंग अस्पताल है, एक से ज्यादा मेडिकल कॉलेज हैं, ढेर सारे चिकित्सा संस्थान और अस्पताल हैं। निजी अस्पतालों की भव्य इमारते हैं। लेकिन 724 अस्पतालों वाला यह महानगर उन्हें निराशा ही दे सकता है। इन अस्पतालों में कुलजमा 36,352 बेड हैं जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लिए ही नाकाफी हैं। इन दिनों राजधानी में जब डेंगू रोग फैला है तो हालत यह है कि मरीजों को अस्पतालों में एडमीशन तक नहीं मिल पा रहा। यहां तक कि उन मरीजों को भी जो इलाज के लिए पैसे खर्च करने को तैयार हैं। सरकारी अस्पतालों में तो हालत यह है कि एक-एक बेड पर चार-चार मरीजों को एक साथ लिटाया जा रहा है। यह उस राजधानी की बात है, जहां अगले साल राष्ट्रमंडल खेल जैसा बड़ा आयोजन होना है और उसके लिए होटलों व सड़कों समेत कई तरह का इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार हो रहा है, लेकिन चिकित्सा जैसी मूलभूत जरूरत उस वृहद योजना में भी नजरंदाज हो रही है। दिल्ली में तो फिर भी गिनाने के लिए ढेर सारे अस्पताल हैं, लेकिन देश के अन्य नगरों में न तो ऐसी चिकित्सा सुविधाएं हैं और न ही नए अस्पताल खोले जा रहे हैं। हालांकि तकनीक ने यह मुमकिन बना दिया है कि दूर-दराज के इलाकों में भी आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लेकिन यह हमारी सरकारों की प्राथमिकता में नहीं है, इसलिए मरीजों को उन सुविधाओं के लिए भटकना पड़ता है, जो दरअसल उसका अधिकार हैं। हर व्यक्ति को जरूरी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का काम तभी हो सकता है कि जब इसकी योजना वृहद पैमाने पर बनाई जाए। इसलिए भी कि छोटी-छोटी योजनाएं इतनी विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकतीं। और इसलिए भी कि हर व्यक्ति को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराए बिना हम विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में कदम भी नहीं बढ़ा सकते। स्वास्थ्य योजनाओं की हमारी सारी बहस अभी तक निजी क्षेत्र बनाम सरकारी क्षेत्र में ही उलङी हुई है, जबकि जरूरत इसके आगे के समाधान खोजने की है।

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