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25 जनवरी, 2020|5:04|IST

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आम चुनाव : चेतना का समय फिर आ गया

प्रिय मतदाताओ, 16 मई 0तक सारी ताकत अब आपके हाथ में है। स्याह भी आप ही करेंगे और सफेद भी। उसके बाद फिर बाड़े के दरवाजे बंद। लेकिन घबराएं नहीं। हम जनतंत्र के वासी हैं। सब तरफ जो हो रहा वह आपके सामने है। पहले खेल भावना को महत्व दिया जाता था और कहा जाता था कि खेल भावना शत्रुता से बचाती है लकिन पाकिस्तान में जिस प्रकार श्रीलंका के क्रिकेट खिलाड़ियों पर गोलीबारी की गई उससे महसूस हुआ कि इस कहावत की उम्र भी ‘बातमीज बानसीब’ की तरह खत्म होन को है। शायद अब बल्लों की जगह एके-47 और गेंद की जगह गोलियां ले लेंगी। एम्पायरी करेंगे ओबामा और तालिबान के मुखिया। लकिन इसे जैसे भी होगा सबको मिलकर रोकना होगा। मजहब सबसे ऊपर है, पर अगर इंसानियत और इंसान को बचाना है तो खेल भावना को तराीह देनी होगी। बचपन में जब ध्यानचंद का जमाना था। तब कई बार हॉकियां निकल आती थीं। लकिन कुछ देर तक खटपट होती थी, मैच फिर चालू। मैच खत्म होने पर खिलाड़ी एक दूसरे के गले मिले और शांति। शायद उसी का उदाहारण लेकर दिग्विजय सिंह सपा और कांग्रेस के बीच दोस्ताना मैच यानी चुनाव की बात करते घूम रहे हैं। नई पीढ़ी को कहां पता ऐसा भी होता था। हम अपने अधिकारों को पहचानते हैं। लकिन उनकी रक्षा के लिए कुछ नारे, कुछ दबंग, कुछ सत्ता में बैठे स्वार्थी या बाहर इंतजार में खड़े बाहुबली हमें उन हथियारों की तरह सौंप देते हैं, कह देते हैं जब तक हम अंदर नही पहुंचते और अंदर वाले बाहर नहीं निकलते तुम इन हथियारों को भांजते रहो। पर उनकी चालाकी से अपनी दानिशमंदी को बचाना होगा। वरना न खेल बचेंगे और न खेल भावना। यह देश एशिया क्या विश्व का सबसे बडा जनतंत्र है। भारत ही पहला देश है, जिसमें बिना लिंग, जाति, आय धर्म आदि के विचार के सबको समान मताधिकार मिला। जबकि संसार के सबसे शक्तिशाली और धनी देश अमेरिका में रंगभेद के चलते 1में कालों को पहली बार मताधिकार दिया गया, उसी का नतीजा है कि ओबामा पहला काला राष्ट्रपति अमेरिका के सिंहासन पर बैठा। हम गरीब देश हैं, उसके बावजूद विश्व भर में आई मंदी की इस आंधी में यूरोप के धनी देशों से बेहतर हालत में हैं। हमारे बैंक फेल नहीं हुए। हमारे 60 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के आस-पास बताए जाते हैं। शायद हैं भी। लकिन अमेरिका से निकाले जान की हालत का सामना करने से बेहतर स्थिति में है। अपने घर में तो हैं। अपनी इंसानियत को गरीबी के बावजूद बचाए हुए हैं। कम खाते हैं और गम खाते हैं। हमारे गावों में बैंक नहीं पोस्ट ऑफिस हैं, अगर सौ रुपया कमाते हैं ता कोशिश करते हैं वक्त जरूरत के लिए पासबुक में पचास डाल दें। किसी को दस हजार एरियर मिल गया तो वह तब तक नहीं निकालता जब तक जान पर ही न बन आए। यह क्रिकेट है न हॉकी यह मात्र चूल्हे का सम्मान है। पहल कहा जाता था कि अगर घर में कुछ नहीं होता था तो चूल्हा जला कर पतीले में पानी चढ़ा दिया जाता था। पड़ोस वाले यह न समझें कि आज घर में कुछ नहीं, इसलिए चूल्हा नहीं चढ़ा। हमने इस अपनी छोटी सी बचत के सहारे इतने बड़े देश की इकॉनोमी को फेल नहीं होने दिया। मुंबई पर हुए हमले पर भी अपने होश हवास को इकॉनोमी की तरह दुरुस्त रखा। आज यही काम चुनावों के घोषित होने पर करना है। जैसे पैस की बचत करके देश की इजत को बचाया उसी तरह अपनी वोट की इजत को देश की राजनीति को भेड़चाल से जात-पात और धर्म से बचाना है। पुराने अनुभव को सामने रखकर नई संभावनों को खोजना है। जिसने जनहित देखा उसे आगे बढ़ाना है। जिसकी संभावना कुर्सी पर न होकर जनहित में हो उसे जनता तक ले जाना है। संसद में बैठी महिलाएं अधिकारों की बात करती-करती थक गईं, कुछ कर पाईं? बांदा के गुलाबी साड़ी ब्रिगेड ने अपनी आजादी का रास्ता स्वयं खोज निकाला। स्वामी रामदेव कानपुर में डेरा डालकर गंगा की शु िका पाठ पढ़ाकर चले गए। अब जूस और फलों के अर्क की कंपनी के सीईओ बन गए। कानपुर बाट जोह रहा है, कब गंगा का तारणहार आता है। गंगा को शोधता है। बस कुछ ट्रेनें जरूर चली हैं, कानपुर से दिल्ली और मुंबई। उन नेताओं को पहचानना है जा कहते हैं तू चल मैं आया। काश हम यह कह सकते-ड्ढr आखिरी बादल हैं,ड्ढr एक गुजरे हुए तूफां के हम़.़. द्दन्rन्द्मन्ह्यद्धorद्ग ञ्च 4ड्डद्धoo.ष्oद्व लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।

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