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आप भी बन सकते हैं सचिन

भारत में क्रिकेट यदि धर्म है तो सचिन उसके भगवान। यही कारण है कि सभी उन्हें लंबे समय तक खेलते हुए देखना चाहते हैं। सब को अपनी धुन पर थिरकाने वाले सदी के इस महानतम बल्लेबाज से प्रेरित होकर क्रिकेट में करियर संवारने का सपना अधिकांश युवाओं का होता है। उन्हीं सपनों को पंख लगाता संजीव चन्द का आलेख-

वर्ष 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ कराची में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले सचिन तेंदुलकर के बारे में शायद किसी ने कल्पना भी न की होगी कि क्रिकेट के इस शहंशाह का सफर 20 वर्षों तक रोशन रहेगा। आज क्रिकेट के बेताज बादशाह का तमगा पा चुके सचिन का हर कोई मुरीद है। क्रिकेट खेलने, देखने व इसमें करियर बनाने की इच्छा पालने वाले हर शख्स के वे रोल मॉडल हैं। पैरेन्ट्स भी अपने बच्चों को सचिन जैसा बनने के लिए हर संभव सहायता उपलब्ध करवाते हैं। आमतौर पर माना जाता है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं भरा खेल है तथा इसमें करियर भी अनिश्चितता से भरा होता है, लेकिन सचिन ने यह साबित कर दिखाया कि यदि किसी के अंदर जुनून एवं जज्बा है तो उम्र व समय का बंधन आड़े नहीं आता है। जब भी उनकी क्षमता एवं फिटनेस पर उंगली उठी, तब-तब उन्होंने अपने बल्ले से अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया। निश्चित रूप से सचिन ने क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसे अध्याय को जन्म दिया है जिसे शब्दों में समेट पाना संभव नहीं है।

विश्व क्रिकेट की बाइबिल में सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में शुमार हो चुके सचिन के पास आज उपलब्धियों की लंबी फेहरिस्त है। यदि उनके शुरुआती शिक्षा पर नजर डालें तो शारदाश्रम विद्या मंदिर में कोच रमाकांत आचरेकर ने उन्हें क्रिकेट की बारीकियां सिखाईं। तेज गेंदबाज के रूप में अपना करियर बनाने के इच्छुक सचिन जब एमआरएफ पेस फाउंडेशन के अभ्यास कार्यक्रम में शिरकत की तो वहां पर तेज गेंदबाजी के कोच डेनिस लिली ने उन्हें पूर्ण रूप से अपनी बल्लेबाजी पर अपना ध्यान केन्द्रित करने को कहा। शायद सचिन को क्रिकेट का देवता बनाने में यह सलाह पहला टर्निंग प्वाइंट थी। उस दौरान सचिन घंटों अपने कोच के साथ अभ्यास करते थे। उनके कोच स्टंप पर एक रुपए का सिक्का रख देते और जो कोई सचिन को आउट करता, वह सिक्का उसी को मिलता था। यदि सचिन बिना आउट हुए पूरे समय बल्लेबाजी करने में सफल हो जाते तो ये सिक्का उन्हीं को मिलता था। इस तरह से सचिन ने कुल 13 सिक्के एकत्र कर लिए जो उन्हें सर्वाधिक प्रिय हैं।

उनकी इस उपलब्धि से प्रभावित होकर छात्रों के मन में यदि क्रिकेट में करियर बनाने की लालसा है तो उन्हें बेहतर रणनीति एवं उत्साह के साथ इस फील्ड में कदम रखना होगा। मानो जैसे कोई क्रिकेटर अपना पहला मैच खेलने मैदान में उतर रहा हो। छात्र चाहें तोइससे पूर्व किसी विशेषज्ञ या काउंसलर की सेवा भी ले सकते हैं। आजकल तो टेस्ट व वनडे के अलावा आईपीएल एवं आईसीएल ने कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को क्रिकेट में करियर बनाने को लेकर उत्साह का संचार किया है।
 
थप्पड़ ने बनाया मास्टर ब्लास्टर
नि:संदेह आज सचिन के विश्वभर में करोड़ों प्रशंसक हैं तथा वे क्रिकेट जगत के सर्वाधिक प्रायोजित खिलाड़ियों में से एक हैं। प्रशंसक उन्हें प्यार से लिटिल मास्टर या मास्टर ब्लास्टर कहकर बुलाते हैं, लेकिन शायद कम ही लोगों को पता होगा कि तेंदुलकर आज जिस मुकाम पर हैं, उसमें उनके गुरु रमाकांत आचरेकर का एक थप्पड़ भी शामिल है। यह बात स्वयं सचिन ने स्वीकार किया। इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि ‘जब मैं 12 साल का था, तो एक बार दादर के शिवाजी पार्क में एक मैच के दौरान अपना मैच छोड़कर सीनियर खिलाड़ियों का मैच देखने चला गया था। यह बात जब शाम को आचरेकर सर को मालूम हुई तो उन्होंने मुझे बुलाया और एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। इस थप्पड़ से मैंने बहुत कुछ सीखा और क्रिकेट के प्रति समर्पित हुआ।’ भाई अजीत तेंदुलकर, पत्नी अंजलि तथा अपने अन्य परिजनों के प्रति भी सचिन कृतज्ञ हैं, जिनके सहयोग एवं स्नेह से उन्हें यह उपलब्धि हासिल हुई।

विशेष योग्यता की दरकार नहीं
क्रिकेट एवं उसके अलावा भी कई खेल ऐसे हैं जिनके लिए किसी शैक्षिक योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। इसमें कोई जरूरी नहीं होता कि वे रात को जगकर किताबें पढ़ें, नोट्स बनाएं या अपना प्रेजेंटेशन दें। सबसे जरूरी मानदंड उम्र को लेकर होता है। इस बारे में प्राइवेट व सरकारी संस्थानों के अलग-अलग क्राइटेरिया हैं। सरकारी संस्थानों में जहां 10 साल का बंधन है, वहीं प्राइवेट एकेडमियों में कोई निश्चित सीमा नहीं है। दिल्ली जिला स्तरीय क्रिकेट में चयन तभी हो पाता है जब खिलाड़ी की उम्र 14 वर्ष हो। स्कूली शिक्षा के बाद दोनों ही स्थानों पर ट्रायल के आधार पर प्रवेश मिल जाता है। सरकारी संस्थान एक माह के ट्रायल के बाद छात्र की अभिरुचि को देखते हुए परमानेंट एडमिशन लेते हैं। जिस छात्र ने 10-18 साल तक किसी लेवल का क्रिकेट नहीं खेला उसे सरकारी संस्थानों द्वारा आगे मौका नहीं दिया जाता।
शारीरिक व मानसिक दृढ़ता आवश्यक
क्रिकेट एक माइंड पावर गेम है जिसमें शारीरिक रूप से तो फिट होना जरूरी है ही, साथ ही दिमागी रूप से भी मजबूत होना आवश्यक है। खिलाड़ी जिन दिनों मैच नहीं खेलता, उस दौरान उस पर लाखों करोड़ों लोगों की नजरें एवं उम्मीदें टिकी होती हैं। इसे लेकर वह अत्यधिक दबाव में भी रहता है। इसलिए उसे मानसिक रूप से दृढ़ होना आवश्यक है।
कई बार ऐसा होता है कि अगले दिन के मैच को लेकर कई खिलाड़ी रात भर सो नहीं पाते हैं। इसके बाद जो सबसे प्रमुख स्किल्स इसमें आगे तक ले जाती हैं वह है कड़ी मेहनत, आशावादी सोच एवं निष्ठा। जब तक आप अच्छा नहीं खेलेंगे, आपकी हर तरफ आलोचना होती रहेगी तथा आपके प्रशंसकों की संख्या भी कम होती जाती है। ऐसे में इन्हीं आलोचनाओं से सीखने का कौशल पैदा करना होता है। सचिन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे अपनी आलोचना एवं तारीफ का मुस्कराकर स्वागत करते हैं तथा अपनी हर आलोचना से सीखने का गुण विकसित करते हैं।

लड़कियों के लिए भी विकल्प
ग्रामीण अंचलों में भले ही क्रिकेट पर सिर्फ लड़कों का एकाधिकार प्राप्त हो, लेकिन शहरी तबके में लड़कियां भी इस क्षेत्र में बराबर की सक्रियता दर्शाती हैं। क्रिकेट खेलने, देखने व पढ़ने में लड़कों से कहीं भी कमतर नहीं हैं। जहां तक क्रिकेट में करियर बनाने का सवाल है तो उसमें उन्हें लड़कों जितना पैसा नहीं मिल पाता, लेकिन फिर भी वह क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना संजो सकती हैं। भारतीय महिला क्रिकेट टीम में शामिल कई प्रतिभावान खिलाड़ी इसका सशक्त उदाहरण हैं। क्रिकेट खेलने के अलावा भी इस क्षेत्र में उनके पास ढेरों विकल्प मौजूद हैं। वे कमेंटेटर, स्पोर्ट्स आरजे व वीजे, स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट आदि बन सकते हैं।

कैसे बढ़ाएं शुरुआती कदम
इसमें सबसे पहले छात्र के रूप में अंडर 14 व अंडर 15 लेवल का क्रिकेट खेलने का अवसर मिलता है। हर एकेडमी व स्टेडियम के अपने क्लब मौजूद हैं, जहां इस तरह के क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन होता है। इसी लेवल से आगे बढ़कर वे अंडर 16 व अंडर 17 लेवल का क्रिकेट खेल सकते हैं। इसमें प्रवेश के लिए आयु प्रमाण पत्र, स्कूली आयु प्रमाण पत्र का होना बहुत जरूरी है। साथ ही उन्हें फिट होना भी जरूरी है। एकेडमी द्वारा सबसे अधिक छात्र के एप्टीटय़ूड को परखा जाता है। उसी के बाद आगे की दिशा तय होती है। हो सकता है कि शुरुआती चरण में सलेक्शन को लेकर उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़े, लेकिन यदि खुद के अंदर काबलियत एवं भरोसा है तो वह आगे की मंजिल तय कर सकता है।

एकेडमी से संबंधित फीस
शुरुआती समय में एकेडमी ज्वाइन करने के रूप में सरकारी संस्थान 250 रुपए प्रतिमाह लेते हैं जबकि स्टेट लेवल खेलने पर महज 100 रुपए ही वसूले जाते हैं। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने वाले खिलाड़ी को सालाना 70 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस के साथ ह्वाइट कार्ड दिया जाता है। इसी तरह से प्राइवेट एकेडमियां छात्रों से 400-1000 हजार रुपए मासिक फीस लेती हैं।

किस ग्रुप में कितना पैसा
हालांकि जिला स्तरीय क्रिकेट खेलने या एकेडमी की तरफ से खेलने के दौरान खिलाड़ी को कुछ खास आर्थिक फायदा नहीं मिलता, लेकिन हुनर सीखने के बाद उसे पैसे की कोई दिक्कत नहीं आती। दिल्ली जिला स्तर के लिए खेलने पर जहां बोर्ड द्वारा निर्धारित एलाउंस दिया जाता है, वहीं 1000-2000 रुपए प्रतिमैच के हिसाब से मिल सकता है। इसके बाद जैसे-जैसे राज्य स्तर की ओर कदम बढ़ते हैं, आमदनी भी बढ़ती जाती है। एक वनडे खिलाड़ी को 3-3.50 लाख, टेस्ट खिलाड़ी को 4-4.50 लाख रुपए प्रतिमैच के हिसाब से मिलता है। इस राशि में हमेशा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। आईपीएल व आईसीएल में बोली के आधार पर पैसा मिलता है। वनडे क्रिकेट में चार ग्रेड तय किए गए हैं-


एक्सपर्ट कमेंट

फिटनेस व जोश आवश्यक
क्रिकेट में फिटनेस विशेष मायने रखता है।
एकेडमी ज्वाइन करने वाले छात्रों के बारे में सबसे पहले यही परखा जाता है कि किस एरिया में उनकी अभिरुचि है तथा उनका मेंटल लेवल किस स्तर का है। ट्रायल के दैरान यह भी पारदर्शिता रखनी पड़ती है कि कहीं छात्रों के साथ किसी तरह की जोर-जबर्दस्ती वाली बात न रहे और वे अपनी इच्छा एवं मेहनत के बल पर ही सफलता की इबारत लिखें। इसमें एकेडमी की तरफ से उन्हें डाइट चार्ट भी प्रदान किया जाता है।
विजय दहिया, दिल्ली रणजी कोच

हर माह टेस्ट का आयोजन
स्कूली स्तर पर छात्रों को एकेडमी ज्वाइन करने के लिए सरकारी स्तर पर कई सहूलियतें दी जाती हैं। इसी क्रम में स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की तरफ से हर माह 7 तारीख को टेस्ट का आयोजन किया जाता है। इसमें छात्र की बॉडी को-ऑर्डिनेशन, क्रिकेट की आधारभूत जानकारियां, एकाग्रता, स्पीड एवं फ्लैक्सिबिलिटी आदि पर ध्यान दिया जाता है। एक माह के बाद परखा जाता है कि छात्र ने कितना कुछ सीखा। बाहर से आने वाले छात्रों को अपने रहने की व्यवस्था खुद करनी पड़ती है। यह प्रशिक्षण उन्हें स्कूल से आने के बाद शाम के समय दो-तीन घंटे के लिए दिया जाता है।
एमपी सिंह, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कोच

ट्रेनिंग के दौरान पढ़ाई पर भी ध्यान
जो भी छात्र क्रिकेट को अपना करियर बनाना चाहते हैं तो उन्हें ओपेन माइंड से इस फील्ड में आना होगा। उन्हें अपने अंदर से यह बात निकाल देनी चाहिए कि इसमेंसिफारिश के बल पर ही आगे बढ़ा जा सकता है। यदि सचिन बनना है तो उसे संयम, प्रतिभावान, अनुशासित व सीनियर खिलाड़ियों की इज्जत करने का कौशल विकसित करना होगा। दिल्ली जिला स्तरीय क्रिकेट ज्वाइन करने के बाद खिलाड़ियों को किसी अनुबंध में नहीं बांधा जाता तथा उनकी पढ़ाई बाधित न हो इसके लिए पूरी सहूलियतें दी जाती है। ट्रायल के दौरान छात्र का मेडिकल टेस्ट, बोन टेस्ट व अन्य प्रमाण पत्रों की जांच की जाती है।
सुनील देव, स्पोर्ट्स सेक्रेटरी, डीडीसी

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