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मिलें न चलने से 35 हजार लोग बेरोजगार

शुगर मिलों और किसानों के बीच गतिरोध से वेस्ट यूपी में स्किल्ड और अनस्किल्ड एम्प्लाईज के 35 हजार से ज्यादा परिवारों के सामने आर्थिक संकट गहरा गया है। हालात यह है कि एक माह बाद भी इनके घर दिवाली नहीं आ पाई है। सीजनल लेबर्स के सामने तो दो जून की रोटी और ठंड से बचाव के लिए एक स्वेटर या रजाई जुटाना टेढ़ी खीर हो गया है। मिलों का पेराई सत्र छोटा होते जाने से कान्ट्रेक्ट एम्प्लाईज के सामने  भी वेतन का
मेरठ, सहारनपुर मंडल और बिजनौर जिले में करीब 40 चीनी मिलें हैं।

प्रत्येक चीनी मिल में औसतन 850 से 900 तक सीजनल एवं कान्ट्रेक्ट बेसिस पर कर्मचारी काम करते हैं। तौल लिपिक, सिक्योरिटी गार्ड्स, लोडिंग-अनलोडिंग लेबर एवं सुपरवाइजर,क्लेरिकल वर्कर आदि सीजनल ही रखे जाते हैं। आमतौर पर मिलों का पेराई सत्र 180 दिन होता है लेकिन पिछले साल भी किसानों और मिल मालिकों के बीच गतिरोध के चलते यह 100 दिन पर सिमट गया था। इस बार केवल अस्सी दिन ही रहने के आसार हैं।

मिलें स्किल्ड और अनुबंधित लेबर को ऑफ सीजन में क्षमता और जरूरत के हिसाब से 15 से 20 प्रतिशत तक सैलरी का भुगतान करती हैं। पेराई सत्र छोटा होने से इन कर्मचारियों को वेतन के भी लाले पड़ जाएंगे। उधर मिलें चालू होने के बाद करीब पंद्रह-बीस हजार अन्य लोगों को भी सीजनल काम मिल जाता है। मिलों के बड़े खरीद केंद्रों पर चाय, पान, टायर पंचर, ढ़ाबे लगाने वाले भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।
साब कैसे जलेगा चूल्हा

किनौनी चीनी मिल के क्रय केंद्र पर गन्ने की लोडिंग करने वाले आजमपुर मुलसम गांव निवासी यासीन से जब मिलें न चलने से पैदा हुए संकट पर बात की गई तो उसका दर्द जुबां पर आ गया। बोला म्हारी तो गुजर-बसर गन्ने से ही होती है। बरसात में किसानों की ईख बांधते हैं तो सर्दियों में मिल के कांटे पर नौकरी करते हैं। पत्नी और तीन छोटे बच्चों खेत में छोल लगने पर भैंसों के लिए अगोला ले आते हैं जिससे दूध बेच लेते हैं। ईख में छोल न लगने से चूल्हा तक ठंडा पड़ने की नौबत आ गई है।

बच्चों के लिए स्वेटर तक नहीं है। वलीदपुर निवासी रामभूल बोला मील वाले खुद तो बर्बाद होंगे ही हमें भी बर्बाद कर देंगे। किसाण ने गन्ना बोणा बंद कर दिया तो पूरे जाड्डे भैंसों के लिए चारा न मिल पावैगा और भूसा पहुंच जावेगा 500 के पार। हमें तो पशु भी बेचणे पड़ जावेंगे। इस समय तो खेतों में भी मजदूरी का कोई काम ना है जो दो पैसे मिल जाते। किसाण संकट में है तो गांव में न मकान बण रहे हैं और न दूसरा कोई और काम।

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