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जकात, फितरा रोकेगा सेंट्रल मदरसा बोर्ड

आखिर प्रस्तावित मदरसा बोर्ड एक्ट 2009 में ऐसा क्या है जिसे लेकर देवबन्दी विचारधारा के लोगों ने इसे मानने से साफतौर पर इनकार कर दिया है और बरेलवी विचारधारा के उलेमा-ए-कराम ने भी पाँच ऐसी शर्ते रखी हैं, जिसके बगैर उन्हें यह बोर्ड किसी भी हाल में तसलीम (स्वीकार) नहीं है। वजह, साफ है कि मदरसों को खासतौर पर रमजान-उल-मुबारक के मौके पर मिलने मिलने वाली जकात, फितरा (दान) और बकरीद के मौके पर जानवरों की खालों से मिलने वाली राशि पर मदरसों का एकाधिकार खत्म हो जाएगा। इस तरह के सभी दान सिर्फ और सिर्फ बोर्ड को ही दिए जा सकेंगे। एक्ट में जकात या फितरे का नाम तो नहीं लिया गया है लेकिन ‘हर तरह के दान’ का जिक्र जरूर किया गया है।

‘ड्राफ्ट प्रपोजल टु सेट अप सेंट्रल मदरसा बोर्ड’ में कुल छह चैप्टर हैं जिसमें बोर्ड के मसौदे को विस्तार से बताया गया है। सबसे बड़ा विवाद तो केवल ‘मदरसा’ की परिभाषा को लेकर है, जिसे उलेमा अस्पष्ट बता रहे हैं। मदरसे का अर्थ ऐसी शैक्षणिक संस्था बताया गया है जिसमें मदरसा एजूकेशन दी जाती है और वह बोर्ड से सम्बद्ध हो। बोर्ड ने मदरसा एजूकेशन को प्राइमरी मदरसा (कक्षा पाँच तक), अपर प्राइमरी मदरसा (कक्षा छह से आठ तक), सेकेण्ड्री मदरसा (कक्षा नौ एवं दस) और सीनियर सेकेण्ड्री मदरसा (कक्षा11 एवं 12) में बाँटा है। बोर्ड की कमेटी में चेयरमैन और 15 अन्य सदस्य होंगे।

इसमें देवबन्दी, बरेलवी, अहले हदीस, इमाम शाफई सेक्ट, शिया मसलक, दाऊद वोहरा, ट्रेडीशनल मदरसा एजूकेशन से जुड़ा एक स्कॉलर, अन्य शिक्षा की फील्ड जैसे साइन्स या सोशल साइंस से जुड़े छह सदस्य, एक फिलॉंथ्रॉपिस्ट और दो महिलाएँ होंगी। चेयरमैन तीन साल के लिए केन्द्र सरकार नियुक्त करेगी और उसे किसी भी समय हटाया जा सकता है। बोर्ड को मदरसों को मान्यता, सम्बद्धता, ग्रांट देने, परीक्षा कराने, सिलेबस तैयार करने और पुस्तकें आदि तैयार करने का अधिकार होगा। केन्द्र सरकार भी बिना बोर्ड की सहमति के मदरसों को सीधे ग्रांट नहीं दे सकेगी।

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