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चुनाव के पहले मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित नहीं

चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित करने से राजद-लोजपा गठबंधन परहेज करेगा। यह अलग बात है कि गठबंधन में बड़े भाई की हैसियत रखने के कारण सरकार बनने की नौबत में मुख्यमंत्री राजद का ही होगा। फिर भी किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए प्रचार में भावी मुख्यमंत्री का नाम नहीं आएगा। यह चुनावी रणनीति भी होगी और मजबूरी भी।

रणनीति यह है कि मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित न किया जाए तो एनडीए से नाराज वोटर आसानी से इस गठबंधन से जुड़ जाएंगे। ऐसे वोटरों को समझाया जाएगा कि राजद के दूसरे लोग भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं। वैसे, इस रणनीति में जोखिम भी छिपा है। क्या लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री न बनने की संभावना हो तो राजद के वोटर दिल से मतदान करेंगे। दोनों दलों के रणनीतिकार इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं। राजद इस मुद्दे पर भी अपने लोगों को गोलबंद करेगा। तर्क यह चल सकता है कि अगर अधिक सीटें राजद को मिली तो इन दोनों में से किसी को मुख्यमंत्री बनाने का विकल्प खुला रहेगा। इसलिए गठबंधन के पक्ष में दिल से वोट दें। आखिर अंतिम निर्णय तो विधायकों के बहुमत से होना है। वैसे, भी लालू प्रसाद इन दिनों सर्व स्वीकार्य होने की कोशिश कर रहे हैं। वे जिस जातिवाद के लिए बदनाम हुए थे, उससे दूर जा रहे हैं।

लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान भी चुनाव के दौरान प्रस्तावित मुख्यमंत्री के बदले साझा सरकार के नाम पर वोट मांगेंगे। पिछली बार की तरह पासवान किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री बनाने की जिद नहीं करेंगे। उन्होंने निजी बातचीत में स्वीकार किया कि चुनाव में भावी मुख्यमंत्री का नाम नहीं लिया जाएगा। सदस्यों की संरचना के आधार पर ही मुख्यमंत्री का नाम तय होगा। गठबंधन में शामिल वाम दल इस रणनीति की मजबूरी हैं। भाकपा के राज्य सचिव बद्रीनारायण लाल कहते हैं-वाम दल वसूलन इस बात का विरोधी है कि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित किया जाए। बिहार विधानसभा चुनाव में राजद-लोजपा गठबंधन में अगर वाम दल शामिल होता है तो मुख्यमंत्री का नाम प्रस्तावित करने का सवाल कहां उठता है। 

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