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नींद में भी बल्ला ढूंढ़ता था ये लड़का

नींद में भी बल्ला ढूंढ़ता था ये लड़का

सचिन तेंदुलकर! उसके पेट में एक भेड़िया छुपा है, जो न सोता है और न शांत होता है। वह शतकों का शतक लगाकर रहेगा। मेरे अपने गांव में जहां पहले क्रिकेट को कोई नहीं जानता था, वहां भी इस खेल को पहचान सचिन के बल्ले ने ही दी। गांव के बुजुर्ग मुझसे पूछते थे, ‘तूं की खेडदा एं?’ (तुम क्या खेलते हो), मेरे क्रिकेट बताने पर उनका जवाब होता, ‘अच्छा ओही खेड, जिहड़ी सचिन खेडदा ए।’ (अच्छा वही खेल जो सचिन खेलता है।) उनकी आंखों में एक सम्मान होता है और क्रिकेट के लिए लोगों के मन में यह सम्मान सचिन ने पैदा किया है। उन्होंने देश के करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों को नया जुनून दिया। और लोगों के इस जुनून को जन्म दिया सचिन के अपने जुनून ने।

मुझे याद है सचिन के करियर की शुरुआत। रात का समय था। मैं और मनोज प्रभाकर लाहौर के होटल की बालकनी में खड़े थे, तभी 16 साल का यह लड़का नींद में चलते हुए दिखा, जो कह रहा था, ‘माजा बेट किधर.., माजा बेट किधर..?’ हमने उसे जगाना ठीक नहीं समझा। मनोज प्रभाकर उसे कंधे से पकड़ कर कमरे में ले गए और बिस्तर पर सुला दिया। एक लड़का जो नींद में भी बल्ला तलाश रहा था, उसे देश का महान बल्लेबाज बनना ही था।

सचिन अपनी कमजोरी को ताकत में बदलने वाले शख्स हैं। राह की रुकावट को उन्होंने सफलता में बदला। संकट की घड़ी को अच्छे अवसर में ढालने का हुनर उन्हें आता है। 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ अपने पहले टेस्ट में वह पहली पारी में सस्ते में आउट हुए। पाकिस्तान का पेस अटैक तब सबसे कम उम्र के इस खिलाड़ी के शरीर को भी निशाना बना रहा था। तभी वकार यूनुस की एक बाउंसर सचिन की नाक पर लगी। खून का फव्वारा बह निकला। अली ईरानी स्ट्रेचर लेकर आए। मैं दूसरे छोर पर था, मुझे लगा इस लड़के का क्रिकेट करियर खत्म। लेकिन तभी सचिन स्ट्रेचर से कूद कर मैदान में आ गए। नाक में रूई लगी थी। बोला-मैं खेलूंगा और उन्हें फेंकी गई अगली यार्कर गेंद चार रन के लिए बाउंड्री की तरफ जा रही थी।
 
यही वजह है कि दुनिया में आज उससे बड़ा कोई बल्लेबाज नहीं है। मेरी नजर में तो महात्मा गांधी और सचिन दो ही लोग ऐसे हैं, जिन्हें देखकर हिन्दुस्तान पूरी दुनिया में बेहतरीन नजर आता है। सचिन को सलाम।

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