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हमारी आँखों का पूरा ख्वाब है सचिन

मुझे जानने वालों को पता है कि मैं सचिन तेंदुलकर का हमेशा आलोचक रहा। इस वजह से अकसर सहयोगियों से नोकझोंक भी होती रहती है। शायद मैं ओल्ड फैशंड हूं या सचिन की कामयाबी से जलने वाला इंसान। शायद दोनों ही। लेकिन मैंने हमेशा ही मन ही मन में सचिन के खेल की सराहना की है। हमेशा उसको खेलते देख कर अपने मन से पूछा है कि क्या हाड़-मांस का कोई इंसान इस तरह खेल सकता है। और उसका आलोचक इसलिये रहा कि मन ही मन ये मान बैठा था कि ये नन्हा मास्टर ब्लॉस्टर कभी कोई गलती नहीं कर सकता। इसलिये जब उसे कोई गलत शॉट लगाते हुये देखा, या फिर मामूली गेंद पर आउट होते देखा तो खीज उठा और बोल उठा ये वो सचिन तो नहीं। क्योंकि सचिन तो कभी गलत कर ही नहीं सकता। शायद वो मेरे मन का भगवान था और भगवान तो हमेशा ही परफेक्ट होता है। संपूर्ण, असीमित, अनंत, सारा आकाश। वो धरती के टुकड़े की तरह अधूरा कैसे हो सकता है? बड़े समय के बाद हैदराबाद वनडे में भगवान को उसी लय मे देखा। वही पैरों की थिरकन, हवा मे आने के पहले गेंद को पढ़ने की कला, बैट और गेंद के कांटेक्ट से निकलने वाला संगीत, और फील्डरों को बीच से चीरती गेंद पर विरोंधी गेंदबाजों के चेहरे पर एक साथ बेबसी और सूकून के क्षण, और भारतीय खेमे में भक्तों का चैतन्य-नाद।
यकीन नहीं हुआ कि 1989 में जेएनयू के पेरियार हॉस्टल में जिस छुटकू को वसीम अकरम और वकार यूनूस की गेंद पर सोलह साल की बाली उमर में चौके लगाते हुये देखा था, उसकी हड्डियों में आज भी वही जान बाकी है और हैदराबाद में मिडिल और लेग स्टंप की गेंद पर पैरों पर नाचते हुये मिड विकेट और स्क्वायर लेग के ऊपर उठाकर मारा गया शॉट पिकासो की किसी भी कलाकृति से कम नहीं लगती। और इस शाट के बाद आसमान की तरफ देखकर ईश्वर से चुहल करने का अंदाज दिल के किसी कोने में चुटकी काट गया कि ईश्वर क्यों इतना पक्षपाती है? और क्यों किसी -किसी को इतना दे देता है कि बाकी के लिये उसकी झोली कम पड़ जाती है? 

सचिन को 159 टेस्ट और 435 वनडे, या फिर 12773 और 17178 रन, या फिर 42 और 45 शतक के आंकड़ों से तौलना इस महान खिलाड़ी की तौहीन होगी। आंकड़ों की बात करेंगे तो ब्रायन लारा और रिकी पोंटिग से तुलना करनी होगी और कहीं न कहीं ये कहना पड़ेगा कि वो इन लोगों से बेहतर हैं या कमतर। ब्रैडमैन से बराबरी भी बेकार है। आंकड़ों की कहानी में सचिन की कहानी को तलाशेंगे तो कहना पड़ेगा कि सचिन भारत की जीत में उतने कारगर नहीं रहे, जितना उन्हें होना चाहिये या फिर ये कहानी एक पत्रकार के नाते लिखनी पड़ेगी कि दूसरी पारी में उनके रन और औसत दोनों ही क्यों कम रहे, जबकि पहली पारी में वो कहीं बेहतर खिलाड़ी नजर आते हैं। सचिन का जन्म उस युग में हुआ, जब भारत के सामूहिक मानस ने सदियों बाद अंगड़ाई लेनी शुरू की, वो दुनिया के नक्शे पर अपने को खोजने निकला और जटाजूटधारी भारतीयों की स्टीरियों टाईप इमेज को तोड़ने के लिये उतावला है। वो भारत की आर्थिक क्रांति का वह अंश है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी के अपमान का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदला लेने को व्याकुल है, जो जातिवादी आंदोलन के बरक्स अपनी अस्मिता को खोज रहा है, जो अब समाज और देश के स्तर पर हीन भावना से ग्रस्त होने को तैयार नहीं। सचिन के पहले का भारतीय क्रिकेट इंफीरियारिटी कांप्लेक्स से पीड़ित था। 1983 की जीत के बाद भी, हालाकि कपिल और गावस्कर ने इस ग्रंथि से भारतीय क्रिकेट को निकलने की बहुतेरी कोशिश की, लेकिन वो एक सीमा के बाद कामयाब नहीं हो पाये। 1983 की जीत के फौरन बाद वेस्टइंडीज की टीम का भारत आना और हमें बुरी तरह से रौंदना इसकी एक बानगी भर थी। हम खेलते जरूर थे लेकिन या तो हारने के लिये या फिर ड्रा करने के लिये। विरोधी गेदंबाज के सीने पर चढ़ कर उसका टेटुआ दबाने की मानसिक ताकत हमारे पास नहीं थी। भारतीय टीम हमेशा अंडर-डॉग ही रही। सचिन ने पहली बार विरोधी खेमे में दहशत पैदा की। उसके शॉट की बेअंदाजी ने गेंदबाजों की घिघ्घी बांध दी। सचिन के नाम पर शेन वार्न जैसों को सपना आने लगा। और उसने कबूला भी।

सचिन ने बढ़कर हमला किया तो सौरभ, राहुल, अनिल कुंबले में जोश आ गया। अब भारतीय टीम किसी गोरे या विदेशी के सामने दबने को तैयार नहीं थी। स्टीव वा को टॉस के लिए इंजतार करवाना या फिर लार्ड्स के पेवेलियन में शर्ट उतार कर सौरव का लहराना, उस नये सामूहिक आत्मविश्वास का प्रतीक था, जिसकी वजह से मंदी के दौर में भी भारतीयों को अगले सुपर पावर के रूप मे देखा जा रहा है और जिससे अमेरिका दोस्ती के लिये पलक पांवड़े बिछाये बैठा है। हिंदुस्तान बदल गया है और सचिन इस बदलते भारत की अंगड़ाई है। ये वो अंगड़ाई है, जो 1999 में वर्ल्ड कप के दौरान अपने पिता की मृत्यु के बाद दो दिन के लिये मुंबई आता है और फिर पलट कर वापस जाता है तो सेंचुरी मारकर अपने पिता को श्रद्धांजलि देता है। वो दुखी था लेकिन दुख के समुंद्र में वो गुरुदत्त के अंदाज में अपने आप को डुबोने को तैयार नहीं था।

ये नये भारत का उदय था, और नये भारत के युवा का अपने से बड़ों के प्रति प्रेम के इजहार का नया तरीका और यही है सचिन। सचिन को करोड़ों लोगों की इच्छाओं, आकांक्षाओं में तलाशेंगे तो गलत करेगे, उसे दर्द में तड़पते हुये 1999 में चेन्नई की पिच पर पाकिस्तान के खिलाफ 136 रन बनाने में आंकेंगे तो गलत करेंगे। वो हममें है, आप में है। वो हमसे पहले की पीढ़ी का अधूरा सपना है, जो अपनी कुंठाओं के पार नया संसार रचना चाहता था, वो हमारी पीढ़ी का सपना है, जो अपने कांफिडेंस में पूरी दुनिया को समेट लेना चाहता है, वो हमारे बच्चों की आंखों का वो ख्वाब है, जो विश्वविजेता होना चाहता है। सचिन में अगर हम अपने होने का विस्तार देखेंगे तो उसे समझेंगे। और इस विस्तार में मैं हमेशा सचिन का आलोचक बना रहूंगा, क्योंकि उसकी आलोचना में ही तो मेरी खुद की आलोचना छिपी है। आलोचना नहीं होगी तो विस्तार को विस्तार कहां मिलेगा, और बिना विस्तार के सारा आकाश अपना कब होगा।

लेखक आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडीटर हैं
ashutosh@network18online.com

 

 

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