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मानवता के बीज

मैं देख रहा हूं-लगभग दो घंटे हो गये, अनेक वाहन, व्यक्ति और सवारियां एक ही सड़क से गुजर रहे हैं। इसी प्रकार एक ही बात कहानी है किन्तु शब्द और कहने वाले अनेक हैं। एकता-अनेकता का विचित्र संयोग है। पानी के लिए शब्द अनेक हैं किन्तु अर्थ का शब्द के साथ प्रतिबंध नहीं है, वह भाषा के साथ बंधा हुआ नहीं है।
भूमि पर चलने का हमारा संबंध है किन्तु उसके साथ तन्मयता और तादात्म्य आपका भूमि से तादात्म्य और एकत्व नहीं। वाहनों में तादात्म्य की अनुभूति नहीं होती। आकाश की विशालता पक्षी ही अपने पंखों से नाप सकते हैं, हवाई जहाज में बैठा मनुष्य नहीं। इसी प्रकार जिसके हृदय में मानवता का बीज अंकुरित हुआ है, वही मनुष्य की महानता विशालता को समझ सकता है। जिसके हृदय में मनुष्यता का बीज ही नहीं पनपा, वह इसे नहीं नाप सकता।
सचमुच मनुष्य महान है। मस्तिष्क छोटा और शरीर लघु होते हुए भी उसकी चिंतनधारा विशाल है। मनुष्य है तभी धर्म, दर्शन और भगवान हैं, अन्यथा कुछ नहीं होता। हमारी कठिनाई है कि हम मनुष्य को पहचानते नहीं, पहचानना भी नहीं चाहते। मनुष्य को जाने बिना आदमी धार्मिक बन ही नहीं सकता। मनुष्य और मनुष्य के बीच मानवता का सूत्र था, वह धागा टूट गया। बल्व से प्रकाश आ रहा है, यदि तार का बल्व से संबंध टूट जाए तो बल्व का प्रकाश समाप्त हो जाएगा। इसी प्रकार मनुष्यता का तार टूटने से मनुष्य क्रूर हो जाता हैं आदमी का आदमी से संबंध धर्म के बिना नहीं हो पाता है।
लोगों ने नाम रटना, मंदिर, संत-दर्शनों तक ही धर्म को सीमित कर दिया। इन बाह्य उपासनाओं और क्रियाकांडों में ही धर्म की इतिश्री मानकर बैठ गये। भले ही वे क्रूरता, धोखेबाजी, ईर्ष्या, अन्याय करते हों किन्तु माला जपकर, मंदिर जाकर, आरती और पूजा कर वे धार्मिक बन जाते हैं। आज के धार्मिक की स्थिति दयनीय है। वह धार्मिक बनता है किन्तु क्रूरता भी करता है। क्या धार्मिकता और क्रूरता एक साथ टिक सकती हैं?
 

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