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प्रलय का कारोबार

हमारी दुनिया में दो चीजें एक साथ चलती रहती हैं। पहली यह कि दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे, यानी आज जितना भी बुरा है, कल उससे बेहतर होगा ही। हमारे भीतर का आशावाद भी यही कहता है और मार्क्स से लेकर आल्विन टॉफ्लर तक की कथित वैज्ञानिक सोच भी इन्हीं नतीजों पर पहुंची थी। दूसरी सोच कलयुग बोध की है, जो कहती है कि चीजें लगातार बुरी और बुरी होती जा रही हैं। यह सिलसिला प्रलय, कयामत या डूम्स डे की ओर जाएगा, जब आपकी हमारी यह प्यारी दुनिया खत्म हो जाएगी। एस्ट्रोनॉमिस्ट स्टीफन हॉकिंग जब यह कहते है कि भविष्य के किसी खतरे से बचने के लिए इंसान को दूर आसमान में कोई और वीराना अभी से तलाश लेना चाहिए, और ऐसे ग्रह में जा बसने की रणनीति भी बना लेनी चाहिए तो वे भी एक तरह से ऐसी ही किसी आशंका पर मुहर लगा रहे होते हैं। ग्लोबल वार्मिंग भले ही हमारी दुनिया की वास्तविकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल भी इसी तरह की सोच को बढ़ावा देने के लिए ही होता है। इन दोनों ही तरह की सोच का बाजार है और उनके खरीदार हैं। यह भी कहा जाता है कि हमेशा ही अच्छी चीजों से ज्यादा बड़ा बाजार खराब चीजों का होता है। इसलिए सुखद भविष्य के सपने के मुकाबले कई बार प्रलय ही ज्यादा बिकती है। बाजार में अगर प्रलय के ग्राहक हैं तो उनके लिए नित नए एक से एक उम्दा और आधुनिक प्रोडक्ट आने से कौन रोक सकता है। अब हमारे पास बेहतर कल्पनाशक्ति है, तकनीक है, कंप्यूटर ग्राफिक्स हैं, वचरुअल रियल्टि है, आशंकाओं की जितनी बेहतर और भयावह तस्वीर आज उकेरी जा सकती है, उतनी तो पहले कल्पना भी नहीं हो सकती थी। माया सभ्यता का कैलेंडर आज के सन् 2012 पर जाकर समाप्त हो जाता था। उसके आगे की दुनिया के बारे में वे नहीं सोच पाए, इसलिए उसके अंत की भविष्यवाणी कर दी। लेकिन आज के बाजार ने उस अंत की भविष्यवाणी में भी अपना भविष्य खोज लिया है। इसलिए फिलहाल यही हो सकता है कि प्रलय की खबरों और फिल्मों का मजा लिया जाए। बाकी कल तो किसी ने भी नहीं देखा- न सुखद भविष्य का सपना बेचने वालों ने और न प्रलय के कारोबारियों ने।

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