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सचिन की फिजिक्स-कैमिस्ट्री ने उसे बनाया क्रिकेट का महामानव

ल्ल शाट खेलने के लिए फाइटर पायलट और फार्मूला वन रेसर जितना लेते हैं समय ल्ल लगातार प्रेक्टिस है उनका मूल मंत्र
ल्ल उनकी आदर्श शारीरिक बनावट
ल्ल परफेक्ट टेकनीक
ल्ल ग्रेट टेम्परामेंट 
ल्ल जबरदस्त रिफलेक्सेस।
ल्ल 0.16 सेकंड में कर लेते हैं शाट का चुनाव
ल्ल विज्ञानियों को है उन पर हैरत
ल्ल खेल को लेकर बच्चों सरीखी ललक
ल्ल उनका शरीर विस्फोटक और संयत ऊर्जा का शानदार उदाहरण


सचिन के खेलने का अपना अंदाज है। यह एक रहस्य जैसा है कि सचिन के पास ऐसी कौन सी खासियत है कि बीस साल गुजर जाने के बाद उनका बल्ला मैदान पर तूफान खड़ा करने को तैयार रहता है। इतने अर्से बाद भी वह एक दम फिट और मजबूत नजर आते हैं। उनमें रनों की भूख अभी भी सोलह साल के बच्चों की तरह है। बीस साल में वह इस खेल के जीते-जागते भगवान बन गए हैं। क्रिकेट के इस भगवान को हमने विज्ञान के आधार पर समझने की कोशिश की। आखिर वह इतने महान कैसे बन गए और इस महानता में उनकी शारिरिक और मानसिक दृढ़ता का कितना योगदान है। उनको इस मुकाम तक पहुंचाने का श्रेय उनकी लगन और उस क्रिकेटिया प्रतिभा को जाता है जो कि हर किसी को नसीब नहीं होती। इनको यहां तक पहुंचाने में उनकी शरीर की बनावट का भी पूरा योगदान है। जानकार बताते हैं कि क्रिकेट खेलने के लिए मास्टर ब्लास्टर का शरीर पूरी तरह माफिक है। उनके बल्ले से निकलने वाले रनों के पीछे चार चीजें महत्वपूर्ण रूप से काम करती हैं। यह हैं उनकी आदर्श शारीरिक बनावट, परफेक्ट टेकनीक, ग्रेट टेम्पारामेंट और जबरदस्त रिफलेक्सेस। इन्हीं के कारण सचिन आज तक गेंदबाजों के लिए काल बने हुए हैं।

लिटिल बिग मैन
आपको यह लगता होगा कि ऊंचे कद के बल्लेबाज ज्यादा अच्छी तरह बल्लेबाजी कर सकते हैं, लेकिन आप यहां पर कुछ गलत हैं। अगर हम कद के रूप में महान बल्लेबाजों का नाम लें तो निश्चित रूप से छोटे कद के बल्लेबाज ही शीर्ष पर हैं। सचिन का कद सिर्फ 5 फुट पांच इंच है और विश्व क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज हैं। इसी कड़ी में उनकी कद काठी के सुनील गावस्कर का नाम आता है। जो कि उन्हीं की तरह पांच फुट पांच इंच के हैं।
इस खेल के डॉन सर डॉनल्ड ब्रेडमैन भी छोटे कद के बल्लेबाज थे, लेकिन उन्होंने जितने ताकतवर अंदाज से बल्लेबाजी की वह अपने आप में एक मिसाल है। वह पांच फुट सात इंच के थे। उन्होंने 1930 में बल्लेबाजी का वह जौहर दिखाया जिसको आज भी बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है। वेस्टइंडीज के महान बल्लेबाज ब्रायन लारा भी इसी सूची में हैं उनका भी कद छोटा था, लेकिन उन्होंने हर तरह की पिच और गेंदबाजों पर पूरे हक के साथ बल्लेबाज की। वह ब्रेडमैन से एक इंच लंबे थे। छोटे कद के वाबजूद लारा पुल शाट पूरे अधिकार के साथ खेलते थे। उनको बल्लेबाजी करते देखना हमेशा एक सुखद एहसास रहा है।

शारीरिक मजबूती
उनकी पारी में बायोमैक्निक नियमों का पूरी तरह पालन होता है जो उनकी बल्लेबाजी को कंपलीट बनाती है। वह अच्छी तरह जानते हैं कि शॉट खेलने के दौरान कंधे का कितना जोर, फुटवर्क व पैरों व हाथों की लंबाई का प्रयोग करना है जो उनको पूर्ण बनाती है। छोटा कद होने के कारण उनके हाथों और पैरों की लंबाई कम है और इसको पूरा करने के लिए सचिन कीमांसपेशियां उनकी पूरी मदद करती हैं। हाथों की मांसपेशियों की परपेक्ट मूवमेंट के लिए फाइबर जिम्मेदार होते हैं। इन्हीं से ही मूवमेंट तय होती है। इस मामले में सचिन काफी लकी हैं। उनके फाइबरों की मदद से परफेक्ट फिजियोलोजिक एक्शन बनता है। शरीर में दो प्रकार के फाइबर होते हैं फास्ट ट्व्चि और स्लो ट्व्चि। फास्ट ट्व्चि फाइबर शरीर के तेज और विस्फोटक ऊर्जा को पैदा करते हैं जिससे तेज मूवमेंट मिलती है और बल्लेबाजी के लिहाज से यह काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वक्त  कम होता है और बल्ले को तेजी से स्विंग करते हुए गेंद की लाइन में लाकर शाट का चुनाव करना होता है। यह स्प्रिंटिंग और जिम्नास्टिक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दूसरी ओर, स्लो ट्व्चि फाइबर की वजह से गेंद से बल्ले का मिलन कराने में आसानी होती है। इससे यह तय होता है कि शॉट के पीछे कितनी ऊर्जा लगाई जाए यानी अगर शॉट पर अतिरिक्त ऊर्जा लग रही है तो इसका मुख्य काम उसको कंट्रोल करने का है ताकि शॉट फील्डर के हाथ में न आए। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि लंबे समय तक काम करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है जो बड़ी पारी खेलने के काफी जरूरी होता है।

पहली ख्वाहिश
सचिन ने यह बताया है कि जब उन्होंने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की तो उन्होंने तेज गेंदबाज बनने की सोची थी, लेकिन वह बल्लेबाज बने। दरअसल, इसमें महत्वपूर्ण भाग यह है कि सचिन के तेज गेंदबाज बनने में उनका कद बाधा है क्योंकि एक तेज गेंदबाज को लंबे हाथों की जरूरत होती है। बायोमैक्निकल नियमों के लिए ऐसा जरूरी होता है। इसे हम आम भाषा में समझें तो एक तेज गेंदबाज के लिए उसका सबसे बड़ा अस्त्र निस्संदेह उसकी तेजी होती है। गेंद को तेज फेंकने के लिए उसका हाथ जितनी तेजी से घूमेगा यानी वह जितना बड़ा राउंड बनाएगा उससे उसे उतनी ही तेजी मिलेगी। इसका मतलब जितना बड़ा हाथ होगा उतनी ही उसे तेजी मिलेगी। जितनी गेंद तेज होगी उतनी ही वह ज्यादा स्विंग करेगी और इसी तरह वह घातक गेंदबाज बन जाएगा। इस मामले में सचिन के हाथ कुछ छोटे हैं जिससे उन्हें तेज गेंदबाज बनने में समस्या हुई, लेकिन यह कमजोरी बल्लेबाजी के दौरान उनके लिए वरदान है क्योंकि वह छोटे हाथों की वजह से अपने शाट्स को जल्द एडजेस्ट कर लेते हैं।

दो-दो हाथ
आपको यह मालूम होगा कि आमतौर पर व्यक्ति कोई एक हाथ से ही मजबूती से काम कर सकता है जैसे की बहुत से लोग राइट हेंडर होते हैं और अन्य लेंफ्ट हेंडर। सचिन को यहां पर भी जबरदस्त एडवांटेज है। वैसे तो वह राइट हेंडर हैं लेकिन उनको लगातार लेफ्ट हेंड से भी थ्रो करते हुए देखा जा सकता है। इसका मतलब उनका लेफ्ट हेंड भी उनका पूरा साथ देता है। शॉट खेलते वक्त यह उनको अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है। वैसे, राइट हेंडर बल्लेबाज के लिए सीधा हाथ ताकत लगाता है जबकि दूसरा हाथ सिर्फ सहारा देता है जबकि सचिन के मामले में गलत दिखाई देता है क्योंकि उनका दूसरा हाथ भी भरपूर मदद करता है जिससे उनके शाट करारे और सटीक होते हैं। सचिन की ऐसी खासियतों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भगवान ने क्रिकेट के इस भगवान को बिल्कुल परफेक्ट बनाया है।

चुस्त शरीर और बॉडी बैलेंस
चीते सरीखी फुर्ती के कारण वह आसानी से मनचाहा शाट खेल लेते हैं। इस दौरान उनका भारी बल्ला रुकावट नहीं पैदा करता बल्कि उनके शॉट की मारक क्षमता बढ़ाता है। वह न्यूटन के क्रिया-प्रतिक्रिया नियम की तरह जोरदार प्रहार कर चीजों को अपने हक में कर लेते हैं। शाट में दो तरह से ऊर्जा का प्रयोग होता है। एक में शाट पर बहुत तेजी से प्रहार किया जाता है, जिसमें ताकत का पूरा इस्तेमाल किया जाता है। दूसरे तरह के शाट्स में गेंद की ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। मतलब कि गेंद को दिशा दिखाई जाती है। इसमें टाइमिंग की अहमियत बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि सही वक्त पर ही गेंद को मोड़ने से ही मनचाहा शाट मिलता है। सचिन का शरीर दोनों ही शाट के लिए आदर्श है। वह जब तेज गेंदबाज को स्मैश करते है तो पूरी ताकत का प्रयोग करते हैं। जब उन्हें कट खेलना होता है तो छोटा शरीर होने के कारण वह आसानी से गेंद की लाइन में आ जाते हैं जो किसी भी बल्लेबाज के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। वह अपने शरीर का भार बहुत जल्दी दूसरी मांशपेशियों पर डाल लेते हैं जो उनके लचकदार शरीर के कारण संभव है। यही लचक खिलाड़ी के लिए सबसे जरूरी होती है। उनका शरीर शॉट खेलने के दौरान पूरी आदर्श स्थिति में होता है। जब वह फ्रंटफुट पर खेलते हैं तो वह अपने शरीर को गेंद की लाइन में लाते हैं, उसके बाद तय करते हैं कि खेलना कहां है। इस दौरान उनकी आंखें दिमाग को बहुत तेजी से संकेत भेजती हैं और वह अपने शरीर के भार को अगले पैर पर ट्रांसफर करते हैं जिसके बाद गेंद पर भरपूर प्रहार करते हैं।
छोटे कद के बल्लेबाजों को पुल शाट खेलने में हमेशा परेशानी का सामना करना होता है, लेकिन जब हम सचिन तेंदुलकर और सुनील गावस्कर को देखते हैं तो ऐसा नहीं लगता। पुल शॉट खेलने के लिए वह पहले से अपने बैट को पिछले पैर पर डाल लेते हैं और इस दौरान उनकी आंखें लगातार गेंद की लंबाई और ऊंचाई को नापती रहती हैं। बॉडी का वजन ट्रांसफर हो जाने से वह गेंद के ठीक नीचे आ जाते हैं और सही टाइम चुनते हैं। इस दौरान आपके दिमाग में यह बात आ रही होगी, आखिर भारी बल्ला इस तरह के शाट्स में बाधा उत्पन्न नहीं करता, तो जवाब है नहीं। बल्लेबाजी करते समय कई मांसपेशियां एक साथ काम करती हैं और शॉट के दौरान यह पूरी एक श्रृंखला बनाती हैं। सचिन इस पूरी सीरीज को एकसाथ कंपलीट करने में माहिर हैं। सबसे पहले उनकी आंखें गेंद को देखती और उसकी लंबाई नापती हैं। उसी के अनुसार तय हो जाता है शॉट का भविष्य। इस तरह के शॉट्स में उनकी टाइमिंग देखने लायक होती है।

चील जैसी तेज़ आंखें
हम बात करते हैं सचिन के रिफलेक्सेस की। यह पूरी प्रक्रिया सबसे पहले आंखों से शुरू होती है। आंखें दिमाग को संदेश भेजती हैं और उसके बाद संबंधित अंग काम करना शुरू कर देता है। सचिन के बारे में इसको हम इस तरीके से समझ सकते हैं कि क्रिकेट की गेंद का वजन लगभग 160 ग्राम होता है और अगर गेंदबाज 150 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से बालिंग करे तो बल्लेबाज तक गेंद सेकंड के आधे हिस्से से भी कम समय पर पहुंच जाएगी। ऐसे में एक बल्लेबाज के लिए छोटी सी भी भूल खतरनाक साबित होगी। 150 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार की गेंद के सामने बल्लेबाजों पर प्रतिक्रिया का वक्त औसत रूप से 0.25 निकाला गया है, लेकिन सचिन के मामले में आप यह जानकर आप दांतों तले उंगिलयां चबा लेंगे कि वह सिर्फ 0.16 सेकेंड में यह फैसला कर लेते हैं कि उनको कैसा शॉट खेलना है। यह टाइमिंग उनको फाइटर प्लेन के पायलट और फामरूला रेस के ड्राइवर के साथ ला खड़ा करती है क्योंकि वह भी प्रतिक्रिया के लिए इतना ही वक्त खर्चते हैं। विज्ञानी हैरान है कि आखिर मास्टर ब्लास्टर कैसे इस कारनामे को अंजाम दे देते हैं।

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