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बिना बीएड के एमएड कराने की तैयारी

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने अध्यापक शिक्षण के लिए कई बदलाव करने का मन बनाया है। सिलेबस तैयार करने वाली समिति का मानना है कि बीएड छात्रों को पढ़ाने के लिए ऐसे शिक्षक होने चाहिए, जिन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया हो। पीएचडी करने या एमफिल करने वालों को इस तरह की ट्रेनिंग नहीं मिल पाती है, इसलिए भविष्य के अध्यापकों को शिक्षित करना मुश्किल होता है।

परास्नातक के बाद अगर दो वर्षीय एमएड कोर्स तैयार किया जाए तो इससे बीएड में पढ़ाने वाले शिक्षकों का संकट काफी हद तक कम किया जा सकता है। खासबात यह है कि ऐसे शिक्षकों को बीएड किए बिना एमएड करने की छूट मिलेगी।

बीएड कॉलेजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यहाँ छात्रों को पढ़ाने के लिए अब शिक्षकों का संकट होने लगा है। केवल उत्तर प्रदेश में ही बीएड कॉलेजों की संख्या एक हजार तक पहुँच गई है। इसमें औसतन 14 से 15 हजार शिक्षकों की जरूरत है। इनमें कुछ ही कॉलेज ऐसे हैं जो तय मानकों के अनुसार अपने कॉलेजों में स्थायी रूप से शिक्षक रख पाते हैं। शिक्षकों की कमी को देखते हुए एनसीटीई को अक्सर इनमें पढ़ाने के लिए शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता में बदलाव करने पड़े हैं।

पहले बीएड, एमएड के अलावा एमफिल, पीएचडी और नेट की अर्हता थी। इसके बाद जब शिक्षकों का संकट हुआ तो एसीटीई ने एमफिल और पीएचडी से भी छूट दे दी। एक ऐसी भी स्थिति आई जब एमएड किए टीचर नहीं मिले तो केवल बीएड शिक्षक रखने की छूट देनी पड़ी।

उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित महाविद्यालय समन्वय समिति के चेयरमैन विनय त्रिवेदी ने बताया कि एनसीटीई ने नया सिलेबस तैयार कराने के लिए एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने अपनी सिफारिशें दी हैं। इसमें कहा गया है कि बीएड को पढ़ाने के लिए अच्छी क्वालिटी के शिक्षक नहीं मिलते। इसकी भरपाई के लिए परास्नातक करने के बाद एमएड में सीधे प्रवेश दिया जाए और यह कोर्स दो साल का हो।

इसका सिलेबस और ट्रेनिंग ऐसी हो जिसमें बीएड पढ़ने वालों को पूरी तरह प्रशिक्षित किया जा सके ताकि वे प्राइमरी और माध्यमिक स्तर पर पढ़ाने के काबिल हो सकें। इस एमएड को करने के लिए बीएड किए जाने की बाध्यता भी न रहे। इसे एनसीटीई अगले शैक्षिक सत्र से लागू करने की तैयारी में है।

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  • Web Title:बिना बीएड के एमएड कराने की तैयारी