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मत करो कुछ अर्ज, सब तो हैं खुदगर्ज

थोड़ा पानी पीया, याद रब को किया, फिर अपनी ड्यूटी में लग जाते हैं, सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं। मास्टर साहेब, जहां बुलाएं हाजिर हो जाते हैं, क्योंकि हर काम में तो वही माहिर हैं। जनसंख्या की गिनती करनी हो तो मास्टर साहेब, भेड़-बकरी गिनानी हो तो मास्टर साहेब, राशन कार्ड में नाम चढ़वाना हो तो मास्टर साहेब और चुनाव आया तो मास्टर साहेब।

आखिर मास्टर साहेब हैं क्या? हर काम में उनकी बुलाहट। और हो भी क्यों नहीं, अब तक करते-करते सभी काम के मास्टर जो हो गए। वैसे भी मास्टर साहेब राष्ट्रनिर्माता जो कहलाते हैं। इनके बिना सरकार का कोई काम कैसे पूरा हो सकता है। मास्टर साहेब गुस्साए, थोड़ा भुनभुनाए, फिर कहा कि बस भी करो, मत करो कुछ अर्ज, सभी हैं खुदगर्ज। हमें तो ऐसा मर्ज हुआ है, जिसके दर्द का कोई इलाज ही नहीं। दुनिया का सारा बोझ तो हमारे ऊपर ही डाल दिया गया है। अभी आप हमलोगों के काम को पूरा जानते कहां हैं। हमें तो अब स्कूल में रसोई के निरीक्षण और परियोजना के भवन निर्माण में ठेकेदार भी बन दिया गया है। तंग आ गए खुद को राष्ट्रनिर्माता सुनते-सुनते।

राष्ट्रनिर्माता का अर्थ है देश का निर्माण करनेवाला। लेकिन यहां तो हमारे लिए नित-नए कार्य का करने का फरमान जारी हो रहा है। अब देखिए न चुनाव आया नहीं कि सबसे पहले कार्मिक कोषांग में शिक्षकों का ही नाम मांगा गया। एक ने कहा, प्रोफेसर साहेब को भी इलेक्शन में ड्यूटी मिली है। गुरूजी खिसियाए, आगे कहा, मत कहिए प्रोफेसर साहेब लोगन का, एक ठो चुनाव में ड्यूटी मिला तो लगे छिलमिलाने, कैसे नाम कटे, लगे जुगत भिड़ाने।

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