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ग्रामीणों पर दवाई तो शहरियों पर पढ़ाई का बोझ

ग्रामीणों को सबसे अधिक खर्च इलाज पर करना पड़ रहा है। जबकि शहरी क्षेत्र के लोगों का आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन द्वारा शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रोंे में कराए जा रहे सर्वे से फिलहाल यही रुझान मिल रहा है। आम लोगों के जीवन स्तर में कितना सुधार आया है। लोगों को सरकारी सुविधाएँ कितनी मिल रही है तथा उपभोक्ता किस पर अधिक खर्च कर रहा। इन सभी पहलुओं का अध्ययन करने के लिए रैण्डम सर्वे दो माह से कराया जा रहा है।

अर्थ एवं संख्या विभाग के अधिकारी व कर्मचारी राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन द्वारा चयिनत किए मुहल्लों व गाँवों का सर्वे करते हैं। इससे पहले कई मुहल्लों का सर्वे हो चुका है। इधर पाँच दिन के दौरान बहरिया, सैदाबाद व शहर के मीरापुर व आसपास के मुहल्लों में सर्वे कराया गया। मीरापुर व आसपास के मुहल्लों में निम्न, मध्यम व उच्च वर्ग के परिवारों से पूछताछ की गई। हर तबके लोगों का कहना था कि उनका पढ़ाई पर सबसे अधिक खर्च है। निम्न आय वर्ग लोग भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने चाहते हैं।

मध्यम तबका तो सबसे अधिक परेशान है। इस तबके के लोग तो बच्चों को महँगे स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए कर्ज भी ले रहे हैं। महँगाई बढ़ने से शहरियों के खानपान का बजट भी काफी बढ़ गया है। पाँच निरीक्षकों के साथ उपभोकता खर्च का जायजा ले रहे सहायक संख्याधिकारी मोहम्मद हैदर ने बताया कि सर्वे रिपोर्ट तो सीधे लखनऊ भेजी जाती है। इसी सर्वे के आधार पर एक निर्धारित फामरूले से पूरे जिले का आँकलन कर लिया जाता है। पूछताछ से शहरी क्षेत्र में यही रुझान मिला है कि लोग लक्जरीयस चीजों पर भी अपनी आय से अधिक खर्च कर रहे हैं। घर को आधुनिक सुविधाओं से युक्त करने के लिए लोग लोन भी ले रहे हैं।

शहरी क्षेत्र में हेल्थ के प्रति लोग काफी जागरूक हुए हैं। इलाज के लिए लोग बीमा करा रहे हैं। शहरियों में बचत के प्रति रुझान काफी कम हुआ है। ग्रमीण क्षेत्रों का जायजा लेकर लौटे जिला अर्थ एवं संख्याधिकारी एसएन त्रिपाठी ने बताया कि गाँवों में स्थिति उल्टी है। ग्रामीणों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आई है। वे बेहतर इलाज के लिए खर्च भी कर रहे हैं। उनकी मजबूरी भी है।

सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए मजबूरी में उन्हें निजी डाक्टरों से इलाज कराना पड़ रहा है। इससे उनका खर्च बढ़ गया है। ग्रामीण क्षेत्र में अभी बच्चों को बेतहर शिक्षा दिलाने का क्रेज केवल उच्च व कुछ मध्य उच्च आय वर्ग में ही है। सामान्य मध्यम व निम्न आय वर्ग के लोग शिक्षा पर बहुत कम खर्च कर रहे हैं। हालाँकि प्राथमिक विद्यालयों में दोपहर का भोजन व यूनिफार्म मिलने से स्कूलों बच्चों की संख्या बढ़ी है।

जो लोग पहले बच्चों को काम पर लगा देते है अब वे स्कूल भेजने लगे हैं। महँगाई से ग्रामीणों के खानपान का खर्च भी बढ़ा है लेकिन ग्रामीणों में बचत की परम्परा अभी बरकरार है। किसान भी जागरूक हो रहें हैं। वह फसल को तुरंत बेचने की बजाय भंडारण भी कर रहे हैं।

बाजार को देखकर ही वह अपना अनाज बेच रहे हैं। सुखद पहलू यह है कि किसानों का नजरिया अब व्यवसायिक हो रहा है। ऐसे लोगों की तादाद तो अभी कम है लेकिन ये लोग गाँव वालों के लिए मॉडल बन चुके है। इनके जीवन स्तर में आए बदलाव को देखकर आम किसान भी अब उसी राह पर चलने लगा है।

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