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मरना तो है ही, नक्सली मारेंगे या पुलिस

जमशेदपुर शहर से सटे सिसिदा गांव में पिछले एक साल से कोई सरकारी अफसर नहीं पहुंचा है। गांव के सुबोध सरदार बताते हैं कि यहां कभी-कभार पंचायत सेवक आता है और वह भी कुछ देर के लिए। वजह? पूछने पर सुबोध चुप हो जाते हैं। सुबोध की यह चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है। सुदूर गांव में सरकारी अफसर या डॉक्टर का नहीं पहुंचना और इसकी वजह के बारे में ग्रामीणों का बात करने से कतराना- दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है। डर माओवादियों का है।  

कोल्हान के तीनों जिले (पश्चिम सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां)  माओवादियों के प्रभाव वाले हैं। लेकिन, किसी विधानसभा क्षेत्र में माओवाद मुद्दा नहीं है। प्रत्याशी तो दूर, कार्यकर्ता भी इस बारे में चर्चा नहीं करना चाहते हैं। डुमरिया के बादलगोरा गांव के सुनाराम हांसदा कहते हैं कि नक्सलग्रस्त गांवों के ग्रामीण हों या बड़े नेता, वे इतने भयभीत हैं कि माओवाद को चुनावी मुद्दा नहीं बनाना चाहते हैं। नक्सलवाद की आड़ में नेताओं और अफसरों के एक समूह ने सरकारी राशि की लूट का जरिया बना रखा है।

कोल्हान के 14 विधानसभा क्षेत्रों में से जमशेदपुर पश्चिमी और पूर्वी विधानसभा सीटों को छोड़ बाकी 12 विधानसभा सीटों के पूर्ण या आंशिक भू-भाग पर माओवादियों का गहरा प्रभाव है। ऐसे गांवों में माओवादियों का सशस्त्र दस्ता न केवल शेल्टर लेता है, बल्कि छोटे-मोटे विवाद भी थाना-पुलिस की बजाए भाकपा (माओवादी) की निचली कमेटी द्वारा निबटाए जाते हैं। कोकरो गांव के एक ग्रामीण (सुरक्षा के ख्याल से नाम नहीं बताया) माओवादी प्रभाव वाले गांवों की दोहरी पीड़ा के बारे में बताते हैं। उनका कहना है कि हम ऐसे गांव में रहते हैं, जहां एक तरफ शेर और दूसरी तरफ बाघ अपना मुंह बाए हुए है। यदि माओवादियों की बात नहीं मानी तो जान का भय और यदि पुलिस को इसकी खबर लगी तो प्रताड़ना। माओवादी दस्ता पहाड़ से सटे गांवों में रात में ठहरता है। उनके लिए भोजन की व्यवस्था ग्रामीणों को करनी होती है। कुछ दिनों के बाद जब पुलिस को इसकी जानकारी मिलती है, तो वे पहुंच कर ग्रामीणों को प्रताड़ित करते हैं।

भाकपा (माओवादी) ने विधानसभा चुनाव में वोट बहिष्कार का नारा दे रखा है। माओवादी ऐसे नारे पहले के चुनावो में भी देते रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि कुछ अपवाद को छोड़कर बाकी माओवादी इलाकों में थोक के भाव में वोट पड़ता है। जमशेदपुर के व्यापारी रमेश शर्मा कहते हैं कि अब पानी सिर से ऊपर बहने लगा है। कोई राजनीतिक दल माओवादियों के खिलाफ बोल कर चुनावी समीकरण को गड़बड़ करना नहीं चाहता। वोट बहिष्कार का नारा और अपने कैडरों से वोट दिलवाना,  इस अंतर्विरोध के पीछे कुछ न कुछ तो है।

यहां समस्या ज्यादा गंभीर-
घाटशिला, बहरागोड़ा, चक्रधरपुर और मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र पश्चिम बंगाल से सटा हुआ है। इसके अलावा जुगसलाई का पटमदा का इलाका भी पश्चिम बंगाल की सीमा से मिलता है।

यहां भी जड़ें गहरी-
सरायकेला, पोटका, चाईबासा, जगन्नाथपुर, खरसावां, ईचागढ़ और मंझगांव विधानसभा क्षेत्र के ज्यादातर भू-भाग माओवादियों के प्रभाव वाले हैं। चुनाव में हिंसा की घटनाओं की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।

प्रमुख माओवादी घटनाएं-
2007 में होली के दिन माओवादियों ने झामुमो के सांसद सुनील महतो की बागुड़िया में हत्या की।
10 जून, 2009 को पश्चिम सिंहभूम के सेरेंगदा में विस्फोट में
23 अगस्त, 2009 को चक्रधरपुर के राक्सी  में स्टेशन पर विस्फोट।
25 अगस्त, 2009 को टुनिया में रेल पटरी उड़ाई। 
13 अक्तूबर, 2009 को बंद के दौरान नक्सलियों ने लौह अयस्क की ढुलाई रोकी।
27 अक्तूबर, 2009 को  झाड़ग्राम के पास नक्सलियों ने राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बनाया।
12 नवंबर, 2009 को सोनुवा और मनोहरपुर में तीन जेसीबी मशीनें फूंकी

माओवाद के लिए उर्वर जमीन-
कोल्हान में गरीबी रेखा से नीचे 62-65 फीसदी आबादी रहती है।
पश्चिम सिंहभूम और सरायकेला में साक्षरता दर 50. 8 फीसदी है।
ग्रामीण इलाके आज भी सड़क, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
विद्रोह की ऐतिहासिक परंपरा रही है।
बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण विस्थापन हुआ, लेकिन उचित पुनर्वास नहीं हुआ।
चाईबासा में 15 खदान और डेढ़ सौ क्रशर हैं। ज्यादातर से माओवादी लेवी लेते हैं।
जंगल और पहाड़ माओवादियों के छुपने के लिए अनुकूल हैं।

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