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जल रहा है गन्ना, सो रही सरकार

गन्ना विकास और चीनी उत्पादन में लगातार पिछड़ते उत्तराखंड के लिए केंद्र का नया अध्यादेश बड़ी मुसीबत बन गया। फिलहाल, राज्य में गन्ना मूल्य संबंधी समस्या का कोई समाधान सरकार के पास नहीं है। चीनी मिल लॉबी पर दबाव बनाने या बात करने के बजाय गन्ना मंत्री ने हाथ खड़े कर दिए है। किसान सड़क पर है। राज्य सरकार, केंद्र से अध्यादेश को वापस लेने की बात कहकर इतिश्री कर रही है।

केंद्र के अध्यादेश के बाद कोई भी राज्य 129 रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा एसएपी घोषित नहीं कर सकता। यदि ऐसा करता है तो ज्यादा भुगतान की जवाबदेही राज्य सरकार की होगी न कि चीनी मिलों की। तीन सप्ताह पहले अध्यादेश जारी होने के बाद से ही पश्चिमी यूपी और उत्तराखंड का गन्ना किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहा है। यूपी में तो राजनैतिक दलों ने इस मुद्दे को हाईजैक कर लिया लेकिन उत्तराखंड के सियासी दल पूरी तरह से खामोश है। जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिल संघ पर दबाव बनाकर 180 रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान कराना लगभग तय कर लिया है।

लेकिन उत्तराखंड सरकार ने अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं किया। राज्य के गन्ना विकास व चीनी उद्योग मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि चीनी मिलों से बात करने का कोई फायदा नहीं है। हम तो केंद्र पर अध्यादेश को वापस लेने का दबाव बना रहे है। लेकिन यदि अध्यादेश वापस नहीं हुआ तब सरकार क्या करेगी इसका कोई जवाब गन्ना मंत्री के पास भी नहीं है। केंद्र का अध्यादेश और राज्य सरकार द्वारा कोई प्रयास नहीं करना राज्य के चीनी उद्योग के लिए संकट पैदा कर सकता है। गन्ना क्षेत्रफल और चीनी उत्पादन का ग्राफ पिछले तीन सत्रों में जिस तरह से नीचे आया उसे सरकार ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया।

पिछले तीन सालों में गन्ने का क्षेत्रफल 1.33 लाख हेक्टेयर से घटकर 94 हजार हेक्टेयर रह गया। आधा नवम्बर बीतने के बाद भी राज्य की किसी भी चीनी मिल ने पेराई सत्र शुरू करने की तारीख मुकर्रर नहीं की है। किसान के सामने कहीं बड़ा संकट है। यदि पेराई सत्र शुरू न हुआ तो गेहूं उत्पादन पर इसका प्रतिकूल फर्क पड़ना लाजिमी है।

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