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असंतुष्ट बंधु

दोनों राजा की पार्टी के हैं और दोनों अंसतुष्ट हैं। एक टिकट की संभावना नहीं होने से असंतुष्ट हो गए हैं तो दूसर परमानेंट टाइप के असंतुष्ट हैं। दोनों विधान परिषद के सदस्य हैं और अक्सर एकसाथ देखे जाते हैं। पिछले दिनों उनके असंतोष के रहस्य का ज्ञान लोगों को हुआ। हुआ यह कि दोनों असंतुष्ट एक दिन राजद के थिंक टैंक माने जाने वाले नेता के यहां पहुंचे। जसे ही उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी कि उनकी नजर एक ऐसे आदमी पर पड़ी जो राजा के यहां भी जाते रहते हैं। उसे देखते ही दोनों असंतुष्टों ने गाड़ी घुमाई लेकिन हाय र भाग्य! उस आदमी ने दोनों को देख लिया था। लिहाजा वह वहीं से चिल्लाया- आइये-आइये! घबराइये मत। हमलोगों को पता है कि आपको दिव्य ज्ञान की प्राप्ति कहां से होती है?ड्ढr ड्ढr होली के बहाने सीटड्ढr महाशयजी पुरानी पार्टी के पुराने नेता हैं। लम्बे समय से लोकसभा पहुंचने की इच्छा है। दो-तीन बार किस्मत भी आजमा चुके हैं लेकिन हर बार असफलता हाथ लगी है। महाशयजी की आजकल अपने दल के अध्यक्ष से नहीं पट रही है इसलिए उस क्षेत्र से उन्हें टिकट मिलने की उम्मीद नहीं है जहां से वे लड़ते रहे हैं। लिहाजा होली के दिन वे पुराने राजा के यहां पहुंचे और बधाई तो दी ही, अपने लिए टिकट की व्यवस्था भी कराने की मांग कर डाली। पुराने राजा ने समझाया- देखिये, दो बार तो आप वहां से हार चुके हैं। तीसरी बार की व्यवस्था में क्यों लगे हैं। किसी दूसरी सीट के बार में सोचिये तो देखा जाएगा।ड्ढr ड्ढr ऐसे होता है दावाड्ढr अगर आपको यह भ्रम है कि सीटों का तालमेल केवल बड़े नेताओं की बातचीत से ही हो सकती है तो इसे दूर कर लें। आजकल इस काम में मीडिया के लोगों की भी भूमिका हो रही है। दरअसल बातचीत में जाने से पहले बड़े नेता अपने पसंदीदा मीडियाकर्मी से पूछते हैं- आपको क्या लगता है? इस चुनाव में हमार दल को कितनी सीटें आ सकती हैं? पत्रकार कागज-कलम निकालता है, गुणा-भाग करता है और करीब घंटे भर के बाद बताता है- पांच-छह सीटें। नेता तुरंत इससे दुगुनी सीटों पर अपना दावा पेश कर देता है।

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  • Web Title: बाकी सब बकवास