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वे मंजिल पे पहुंचे, तो मंजिल बढ़ा दी

सचिन तेंदुलकर बतौर टेस्ट खिलाड़ी आज बीस साल पूरे कर रहे हैं। उनकी शानदार ‘रन यात्रा’ में सबसे महत्वपूर्ण क्या है? उनका स्टार बन जाना और बने रहना? लगातार रिकार्ड तोड़ना और बनाना? मैच दर मैच शोहरत की नई बुलंदियां छूते जाना? नहीं। मैं इनमें से किसी को भी बहुत तवज्जो नहीं देना चाहूंगा। सचिन की अकेली खूबी है, उनका स्थायित्व। वे जय-पराजय, सम-विषम सबमें एक से लगते हैं। उनकी यह विशेषता उन्हें दुनिया के किसी भी सितारे, शोहरतमंद या सफल आदमी से पूरी तरह अलग कर देती है।
क्या आपको याद है कि सचिन के साथ उनकी कथनी या करनी से कभी कोई विवाद जुड़ा हो? मन-वचन और कर्म का इतना अद्भुत मेल-मिलाप शायद इससे पहले बहुतों ने नहीं देखा होगा। किसी ने बात का बतंगड़ बनाया भी तो वह अकसर गढ़ा हुआ होता है। इसके पीछे तुक्का उछालने वालों के निजी स्वार्थ होते हैं। जैसे कहा जाता है कि वे मौका देखकर घायल होने का स्वाँग भरते हैं। ऐसा है क्या। अक्ल का अंधा भी बता सकता है कि जिस शख्स को खेलने और सिर्फ खेलने की इतनी जबरदस्त भूख हो, वह पैवेलियन में बैठकर तमाशा नहीं देख सकता। तमाशा देखने वाले सिर्फ तमाशा ही बनकर रह जाते हैं, हर रोज नए इतिहास की रचना नहीं करते। क्या आपने कभी सुना है कि अन्य क्रिकेटरों की तरह सचिन किसी पब में शराब पीकर लुढ़क गए? या, उन्होंने किसी पत्रकार के साथ मारपीट की? या, किसी विज्ञापन फिल्म निर्माता से उनका कोई झगड़ा हुआ? या, किसी फिल्म तारिका के साथ उनके नजदीकी रिश्ते हो गए? उनका नाम जब भी आता है, इज्जत से आता है और उसके पीछे स्थिरता का अनोखा भाव होता है। पल में तोला, पल में माशा होने वाली शोहरत की दुनिया में यह दुर्लभ है।
उन्होंने क्रिकेट खेला तो खेलते चले गए। अंजलि से विवाह किया तो भारतीय परंपरा के अनुसार पूरी तरह से एक पत्नीव्रत के हामी नजर आए। पिता के तौर पर वे पितृत्व से भरपूर दिखते हैं और जब किसी प्रोडक्ट की मॉडलिंग करते हैं, तो निजी जीवन में भी उसे इस्तेमाल करते हैं। अमिताभ बच्चन भी काफी कुछ उनकी तरह नजर आते हैं। पर बहुत से मुद्दों पर वे ‘लिटिल मास्टर’ की बराबरी नहीं कर पाते। मैं तफसील में नहीं जाना चाहूंगा। यह सच है कि अगर सचिन किसी तेल का इस्तेमाल नहीं करते तो उसकी मॉडलिंग भी नहीं करते। पर एक आम हिन्दुस्तानी की तरह। कुछ अंधविश्वास उन्होंने जरूर पाल रखे हैं। वो जब भी पैड पहनते हैं तो पहले अपना बायां पैर आगे बढ़ाते हैं। आपने अक्सर मैदान में उन्हें अच्छा स्कोर खड़ा करने के बाद आसमान की तरफ सिर उठाकर ऊपर वाले को शुक्रिया करता देखा होगा। पर यह इतना निजी मामला है कि इस पर टीका-टिप्पणी करना अनुचित होगा।

पिछले एक दशक से दुनिया के सारे क्रिकेट प्रेमी उन्हें सर्वोत्तम मानते हैं। वे ऐसे बिरले लोगों में शामिल हैं, जो सफलता के मामले में दो शताब्दियों का संगम हैं। निरंतरता शायद तेंदुलकर की जिंदगी का कभी न जुदा होने वाला हिस्सा है। एक बार किसी ने उनसे पूछा था कि इस मुकाम पर आने के बाद आगे क्या? जवाब गजब का था कि आप चाहें जिस भी मुकाम पर पहुंच गए हों, उससे ऊपर पहुंचने का रास्ता हमेशा खुला होता है। यही वजह है कि रनों के पहाड़ में हर बार पहले के मुकाबले ऊंची चोटी गढ़ने के बावजूद वे हर क्षण आगे बढ़ते दिखते हैं। उनके लिए शायद उम्र और उपलब्धियों की सीमा का अर्थ असीमित हो जाना है। मैं जान-बूझकर आंकड़ों की बात नहीं कर रहा। वे तो बच्चों-बच्चों की जुबान पर हैं। हालांकि एक तथ्य की ओर जरूर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा। तेंदुलकर ने टीम का कप्तान बनने से पहले दो कप्तानों के साथ क्रिकेट खेला था। जब वे कप्तानी से हटाए गए, उसके बाद से भारतीय टीम के तीन कप्तान बदल चुके हैं। वे चौथे के साथ खेल रहे हैं। कई कप्तान पूर्व हो चुके हैं। सचिन आज तक साबित कर रहे हैं कि वे अपूर्व हैं। वे क्रिकेट के साधक थे, हैं और हमेशा बने रहेंगे।

मुझे यहां भी उनका एक कथन याद आ रहा है। जब उन्होंने टेस्ट क्रिकेट के 18 साल पूरे किए तो एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप कब तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते रहेंगे? क्या आप रिकॉर्ड बनाते रहना चाहते हैं? जवाब तेंदुलकर की कलाई से उपजे शाट्स की तरह ही जोरदार था कि मैं इसलिए खेलता हूं, क्योंकि मैं क्रिकेट से प्यार करता हूं। मेरे लिए खेलना ज्यादा महत्वपूर्ण है बजाए पुराने रिकार्ड बनाने या उन्हें तोड़ने के। आप समझ सकते हैं कि खेल के प्रति अदम्य लालसा ही उन्हें बीस साल बाद भी खिला रही है। अगर वे खेल रहे हैं, तो रिकार्ड बन रहे हैं और टूट भी रहे हैं। उनके गुरु रमाकांत अचरेकर बड़े गर्व से उन लम्हों को याद करते हैं जब अपने मामा का हाथ पकड़कर ग्यारह साल का एक बच्चा उनके पास आया था। गुरु खुद भी नहीं जानते थे कि वे तकनीक का ऐसा ज्ञान बांटने जा रहे हैं, जो अपनी रोशनी से दुनिया को चकाचौंध कर देगा। वैसे ही जैसे द्रोणाचार्य ने कभी अर्जुन को कमान पर तीर चढ़ाना सिखाया था। बहुत बरस बाद मैदान-ए-जंग में जब उन्होंने अपने शिष्य के करतब से उपजी टंकारें सुनीं तो पता नहीं वे पुलकित हुए थे या नहीं? अचरेकर कभी सचिन के खिलाफ नहीं खड़े हुए, पर उन्होंने जाने-अनजाने क्रिकेट का ऐसा बांकुरा जरूर रच दिया, जिसके शाट्स की ध्वनि से करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के दिल में झंकारें उठती हैं।

दुर्भाग्य है। ठाकरे खानदान ने अपनी करतूतों से मराठियों के प्रति पूरे देश में संशय के बीज बोने की ठान ली है। पर जब तक सचिन जैसे लोग हैं भारत की इस वीर प्रसूता धरती पर कोई दाग नहीं लग सकता। खुद सचिन ने कहा है कि मैं पहले हिंदुस्तानी हूं फिर मराठा। पता नहीं राज ठाकरे और उनकी प्रतिस्पर्धा में खड़े उद्धव को यह बेहद उजला सच क्यों नहीं दिखता? वे अपने तेण्डुल्या से कुछ सीखते क्यों नहीं? तेंदुलकर शानदार क्रिकेट जीवन के बीस बरस पूरा होने पर हम उन्हें आयु और यश की शुभकामनाएं तो देंगे ही। हर कोई चाहेगा कि वे खेलते रहें और रनों का अंबार लगाते रहें। पर पता नहीं क्यों बचपन में जसदेव सिंह के जो कुछ शब्द सुने थे, वे याद आ रहे हैं। अपने पूर्व घोषित आखिरी मैच से ऐन पहले सर्वकालिक महानतम फुटबाल खिलाड़ी पेले भारत आए थे। जसदेव ने उनके खेल की ऐसी कमेंट्री की थी कि उस समय मैं रो पड़ा था। मेरे साथ के सब लोग रो रहे थे। वह टीवी का जमाना नहीं था, इसलिए हमने उनके खेल के बारे में सिर्फ पढ़ा था। बुद्धू बक्से के जरिये सचिन तो जैसे लोगों की आंखों और दिलों में बस गए हैं। वे औरों से इतना आगे निकल चुके हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें सिर आंखों पर बैठाकर रखेंगी। रनों की यात्रा के साथ अमरत्व का यह सफर सचिन को मुबारक हो।

shashi.shekhar@hindustantimes.com

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