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हर तरफ तू ही तू

बीस साल पहले आज के ही दिन सचिन तेंदुलकर ने कराची में पाकिस्तान के खिलाफ अपने टेस्ट करिअर की शुरुआत की थी। इतने साल बाद मीडिया सचिन को देवता बना रहा है। सारे सितारे जैसे उस पर फूल बरसा रहे हैं। लता मंगेशकर चाहती हैं कि सचिन दस साल और खेलें, अमिताभ बच्चन का कहना है, सचिन के खेलते वक्त वे शूटिंग रोक देते हैं, सुनील गावसकर का कहना है, न ब्रायन लारा और न ही रिकी पोटिंग सचिन के आसपास कहीं ठहरते हैं और सानिया मिर्जा बता रही हैं कि सचिन जैसी कोई दूसरी शख्सियत हमारे दौर में है ही नहीं।

इसमें शक नहीं कि इतने साल तक क्रिकेट खेलना और वह भी इतनी कामयाबी के साथ खेलना अपने आप में एक बड़ा पराक्रम है। इसमें भी शक नहीं कि सचिन ने इस दौर में बल्लेबाजी के जैसे सारे कीर्तिमान अपने नाम कर लिए हैं। लेकिन क्या सिर्फ यही वजह है कि भारतीय मीडिया सचिन को ईश्वर जैसी आस्था के साथ जनता के सामने परोस रहा है? दरअसल यह सिर्फ क्रिकेट नहीं, उसके बाहर का कोई जादू है, जो सचिन को यह हैसियत दे रहा है। मीडिया सिर्फ एक बड़े बल्लेबाज के पीछे नहीं, अपने समय के उस नायक के पीछे भी भाग रहा है, जिसका उसने बीते 20 बरस में बहुत जतन से निर्माण किया है। 
असल में सपने और उम्मीद बेचने वाले मीडिया का काम नायकों के बिना नहीं चलता। इत्तिफाक से जिस दौर में सचिन आए, वह एक तरह से नायकविहीन दौर है। राजनीति नाउम्मीद कर चुकी, फिल्मों के नायक सामाजिक सरोकारों को छोड़ निजी सनक की गलियों में उतरते दिखाई पड़ रहे हैं। सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चों पर या तो दिल तोड़ने वाला सन्नाटा है या हताश करने वाला शोर। ऐसे में एक किशोर दुनिया की सबसे मशहूर पेस तिकड़ी- इमरान खान, वसीम अकरम और वकार यूनुस के छक्के छुड़ाता है तो लोग उसमें एक बड़ा नायक देखते हैं। फिर कामयाबियों के ये शिखर लगातार बड़े होते जाते हैं और सचिन का नायकत्व भी। लेकिन यह सिर्फ मीडिया का खेल होता तो कई और खेलों की तरह पिट जाता। यहां दो बातें सच हैं। सचिन सचमुच आज की तारीख में देश के सबसे बड़े नायकों में हैं। हालांकि उन्हें ईश्वर बनाने और बताने वाले लोग सचिन को शायद उतना ही जानते हैं, जितना ईश्वर को। न ईश्वर उनकी सारी मन्नतें सुनता है, न सचिन उनकी जीत की सारी कामनाएं पूरी करते हैं। फिर भी- क्रिकेट के मैदान में ही सही- जब तक सचिन रहते हैं, जीत की उम्मीद रहती है, न हारने का भरोसा रहता है। किसी नायक से हम और क्या उम्मीद कर सकते हैं?
हम चाहें तो क्रिकेट को एक रूपक की तरह देख सकते हैं और समझ सकते हैं कि क्रिकेटरों का कैसे इस देश की बुनावट से नाता बनता है। सचिन जिस सबसे बड़े खिलाड़ी की याद दिलाते हैं, वे सुनील गावसकर हैं, जिनका अभ्युदय 1971 में हुआ। यह वह साल था, जब भारत ने वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड को उन्हीं के घरों में हराया। इसी साल भारत ने बांग्लादेश के युद्घ में शानदार जीत हासिल की और एक राष्ट्र के रूप में खुद पर उठाए जा रहे सवालों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। सत्तर के दशक के उस ठोस और धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे भारत की नुमाइंदगी सुनील मनोहर गावसकर करते हैं। अस्सी का दौर कपिलदेव का है, जो ग्रामीण भारत के आत्मविश्वास और उसकी आक्रामकता का प्रतिनिधित्व करता है।
 नब्बे का दौर उदारीकरण का दौर है और भारत सारी दुनिया के लिए खुल गया है। सचिन इस दौर में उभरते हैं- उनमें सुनील गावसकर का पानी भी है और कपिलदेव की आग भी। ठोस तकनीक और आक्रामक शैली का ऐसा संपूर्ण मिश्रण किसी दूसरे बल्लेबाज में नहीं दिखता। वे आते हैं और दुनिया को चुनौती देने वाले एक भारतीय की छवि का निर्माण करते हैं। इक्कीसवीं सदी के क्रिकेट और उसके नायकत्व की विरासत भी सचिन तेंदुलकर की ही है, जिसकी छाया हम युवराज सिंह के कौशल, वीरेंद्र सहवाग के करिश्मे और महेंद्र सिंह धोनी के धीरज में देख सकते हैं।
ऐसा नायक कहां मिलेगा और मिल जाएगा तो मीडिया उसे पूजने क्यों नहीं लगेगा?
हालांकि इस भावुक सवाल से कहीं ज्यादा वास्तविक यह संदेह है कि मीडिया की यह नायक पूजा कहीं ज्यादा बड़े सरोकार को अनदेखा तो नहीं कर रही? जब इतना बड़ा सितारा हमारे पास है और उसके वैसे ही चमकते वारिस भी तो हम पिछले पांच विश्व कप में एक भी जीत क्यों नहीं पाए? क्या इसलिए कि सितारे टिमटिमाने के लिए होते हैं, टिकने के लिए नहीं? या इसलिए कि सितारों के निजी पराक्रम के बावजूद वह सामूहिक आत्मविश्वास अभी हासिल होना बाकी है, जो हमें एक विजेता राष्ट्र में बदले?

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