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कामयाबी के पीछे खड़ा द्रोणाचार्य

रमाकांत अचरेकर द्रोण परम्परा के गुरु हैं। उन्होंने अपने शिष्यों को सिर्फ चिड़िया की आंख में देखना सिखाया। उनके ‘अर्जुनों’ में शीर्ष पर सचिन तेंदुलकर हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिस शिष्य ने चिड़िया की आंख में निशाना साधने में आनाकानी की वह बुलंदियों के मुकाम पर नहीं पहुंच पाया। सचिन और विनोद कांबली ने उनसे दीक्षा एक साथ ली, लेकिन कांबली सचिन नहीं बन सके। अचरेकर कहते हैं कि सचिन एक बार सीखने के बाद नहीं भूलता है और कांबली अपनी गलतियों को बार-बार दोहराता है। अचरेकर की नर्सरी से बलविंदर संधू, चंद्रकांत पंडित, विनोद कांबली, प्रवीन आमरे, अजित आगरकर, संजय बांगड़ और रमेश पोवार जैसे क्रिकेट के सूरमा पैदा हुए हैं। अचरेकर ने कभी भी देश के लिए क्रिकेट नहीं खेला। फर्स्ट क्लास टूर्नामेंट तक ही वे खेल पाये। इसका उन्हें मलाल नहीं कि वे टेस्ट क्रिकेट नहीं खेल पाये। अलबत्ता उन्हें खुशी है कि वे क्रिकेटर से बेहतर गुरु साबित हुये। 1932 में मुबंई में जन्मे अचरेकर क्रिकेट के जितने महान गुरु हैं, वे उससे कहीं ज्यादा शानदार और विनम्र इंसान हैं। शिष्यों की तमाम गलतियों के बाद भी वे कभी उत्तेजित नहीं होते हैं। मुबंई क्रिकेट टीम के सेलेक्टर होने के बावजूद उन्होंने प्रतिभा के साथ कभी अन्याय नहीं किया। अचरेकर ने क्रिकेट खेलने की शुरुआत 1943 में की। उस वक्त वे छबीलदास हाई स्कूल में पढ़ते थे। 1945 में उन्होंने हिन्द क्लब और यंग महाराष्ट्र एलेवन से खेलना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने गुलमोहर मिल्स और मुबंई पोर्ट के लिये भी खेला। उनके हिस्से फस्र्ट क्लास क्रिकेट खेलने का एक ही मौका मोइन-उद-दौला टूर्नामेंट में आया। इसके बाद उन्हीं के अनुसार वे क्रिकेट की दुनिया में और तरक्की नहीं कर सके। असफल क्रिकेटर से सफल कोच बनने की कहानी भी उनकी कम रोचक नहीं है। बात 1964 की है। उस समय अचरेकर बैंक में नौकरी करते थे और हिन्द क्लब के सेक्रेटरी थे। उन दिनों लेफ्ट आर्म स्पिनर और मौजूदा वक्त के फस्र्ट क्लास अंपायर सुरेश शास्त्री दयानंद बालक विद्यालय में पढ़ते थे। स्कूल को प्रैक्टिस के लिये ग्राउन्ड की जरूरत थी। शास्त्री के आग्रह पर अचरेकर ने स्कूल को प्रैक्टिस की इजाजत दे दी। बैंक की चाकरी के बाद अचरेकर मैदान पर आते और बच्चों को खेलते देखते। उसी दौरान उन्हें सुरेश में एक अच्छे क्रिकेटर की संभावना दिखी। सुरेश के अलावा कुछ और भी अच्छे बच्चों थे। प्रैक्टिस के बाद अचरेकर अच्छे बच्चों को खेल-खेल में उनकी गलतियां और उन्हें सुधारने के तरीके बताने लगे। दयानंद विद्यालय आर्य समाज ट्रस्ट चलाता था। उन्हीं दिनों एक ट्रस्टी का बेटा विद्यालय की टीम में शामिल हुआ। बेटे का प्रदर्शन देखने के लिये उसके पिता नियमित तौर पर मैदान पर आते थे। कुछ दिनों के बाद उन्होंने अचरेकर के सामने अपने बेटे को फुल टाइम कोचिंग देने का प्रस्ताव रखा। इसके लिये उन्होंने पारिश्रमिक देने की बात भी कही। अचरेकर ने ट्रस्टी के फुल टाइम कोचिंग के प्रस्ताव को स्वीकार लिया, लेकिन किसी भी तरह का पारिश्रमिक लेने से मना कर दिया। अचरेकर कहते हैं कि पारिश्रमिक लेने को मना करने के पीछे उनकी सोच थी कि अगर वे क्रिकेट के उच्च स्तर को नहीं छू पाये तो कम से कम मैं उनके लिये मददगार साबित हों, जिनके अंदर प्रतिभा है। और इस तरह अचरेकर फुल टाइम कोच बन गये। उन्होंने अपना पूरा जीवन शिवाजी पार्क के उस मैदान की मिट्टी को समर्पित कर दिया, जिसने देश को सुनील गावसकर से लेकर सचिन तेंदुलकर जैसे महान बल्लेबाजों को पैदा किया। भारत सरकार उन्हें 1990 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाज चुकी है। ढलती उम्र के बावजूद अभी वे क्रिकेट जीते हैं, खाते हैं, पीते हैं और सोते हैं। क्रिकेट को लेकर उनकी चिंताएं हैं कि कम ही नहीं होती हैं।

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  • Web Title:कामयाबी के पीछे खड़ा द्रोणाचार्य