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बल्ले का बलवान, अभी तो है जवान

बल्ले का बलवान, अभी तो है जवान

राकेश थपलियाल।   इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान दक्षिण अफ्रीका के छोटे से शहर ईस्ट लंदन में शाहरुख खान की कोलकाता नाइटराइडर्स प्रैक्टिस कर रही थी। मुंबई इंडियंस की प्रैक्टिस खत्म हुई थी और सचिन तेंदुलकर अपने बेटे अर्जुन के साथ मैदान पर थे। मैंने अर्जुन से पूछा आपका फेवरेट क्रिकेटर कौन है? उम्मीद थी कि जवाब मिलेगा सचिन तेंदुलकर, लेकिन कानों में आवाज गूंजी- क्रिस गेल! मैं एकदम से चौंक गया। जो तेंदुलकर दुनिया भर के करोड़ों क्रिकेटरों के फेवरेट हैं, वह क्रिकेटर बनने के लिए मैदान में पसीना बहाना शुरू कर चुके अपने 9 साल के बेटे के फेवरेट नहीं हैं।

मैंने पूछा गेल क्यों फेवरेट हैं? अर्जुन ने तपाक से कहा, ‘क्योंकि वह अच्छी बल्लेबाजी करते हैं।’ यह सुनकर मैं फिर चौंका और यह सोचने लगा कि क्या सचिन तेंदुलकर इतनी अच्छी बल्लेबाजी नहीं करते कि उनके बेटे के फेवरेट हो सकें। हल्की सी उम्मीद के साथ कि शायद इस बार जवाब में सचिन का नाम सुनने को मिले, मैंने पूछा गेल के अलावा कौन सा बल्लेबाज पसंद है? उम्मीद थी कि शायद अब तो अर्जुन की जुबान से निकलेगा- मेरे पापा या सचिन तेंदुलकर। लेकिन जवाब मिला, ‘एडम गिलक्रिस्ट।’

दो साल पहले मैं मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक रणजी मैच के दौरान देख चुका था कि कैसे सचिन के आउट होने पर निराश हुए अर्जुन ने बालपन में मचलते हुए पूछा था, ‘क्या पापा अब और बैटिंग नहीं करेंगे?’ उस दिन मुझे लगा था कि सचिन के अलावा अर्जुन किसी और बल्लेबाज को पसंद नहीं कर सकता। लेकिन समय बीता और अर्जुन अपने पापा के साथ देश-विदेश के मैदानों में क्रिकेट की दुनिया के तमाम सितारों को खेलते हुए देखने लगा और क्रिस गेल और एडम गिलक्रिस्ट का फैन हो गया। यह दर्शाता है कि सचिन अपने बेटे पर अपने विशाल व्यक्तित्व की आभा छोड़ने की बजाए उसकी अपनी पसंद-नापसंद के लिए खुला आकाश देने में विश्वास रखते हैं। जबकि, कुछ सप्ताह पहले सुनील गावसकर ने ‘एचटी समिट’ में कहा था कि, ‘पिछले बीस साल से हर मां-बाप अपने बच्चों को सचिन तेंदुलकर बनाना चाहते हैं। यह बात किसी भी रिकॉर्ड और उपलब्धि से बढ़कर है।’
 
इस पर बहुत खोजबीन की जाती रही है कि सचिन कैसे इतने महान क्रिकेटर बने हैं? तेंदुलकर सिर्फ इसलिए महान नहीं माने जाते कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हजारों रन बनाए और दजर्नों विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अनेक मील के पत्थर स्थापित किए हैं। वह महान हैं, क्योंकि उनके अंदर बचपन से ही सर्वश्रेष्ठ बनने की चाह रही है और इसके लिए वह किसी भी चुनौती से भागे नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। क्रिकेट के प्रति पूरी तरह समर्पित जीवन बिताया।

पिता रमेश तेंदुलकर महान संगीतकार और गायक सचिन देवबर्मन के मुरीद थे, इसलिए अपने छोटे बेटे का नाम उन्होंने सचिन रखा था। शायद उन्होंने सोचा होगा कि उनका सचिन भी बड़ा होकर संगीत की दुनिया में नाम कमाएगा। लेकिन जब सचिन की क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखी तो बेटे को खूब प्रोत्साहित किया, इस संदेश के साथ कि, ‘जिंदगी में कितने भी उतार-चढ़ाव आएं शॉर्ट कट कभी मत अपनाओ।’ बड़े भाई अजित ने सचिन के क्रिकेट करियर को संभालने की कमान संभाली। अपने शारदाश्रम विद्यामंदिर के कोच रामाकांच अचरेकर के स्कूटर की पिछली सीट में बैठ एक दिन में कई मैदानों पर बल्लेबाजी की। सचिन के शब्दों में,‘ दूसरे साल जब मैंने इंटर स्कूल क्रिकेट में पहला शतक जमाया तो मुझे लगा था कि यह स्पेशल है और अगर मैं इसी तरह से लगातार करता रहा तो चीजें बदल सकती हैं।’

सचिन का वह शतक ही स्पेशल नहीं था, बल्कि उनकी हर पारी स्पेशल होती चली गई थी। जल्दी ही सबकी समझ में आ गया था कि, सचिन एक स्पेशल टेलेंट हैं। सचिन की सोच भी हमेशा से स्पेशल रही है। एक बार अपनी सफलता के मंत्र की तरफ हल्का सा इशारा करते हुए कहा था कि, ‘जिंदगी में सफल वो लोग होते हैं जो चुनौतियों को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। जो चुनौतियों से भागते हैं, वो कभी शिखर पर नहीं पहुंच सकते।’ इसीलिए सचिन बचपन से ही हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। आठ-दस साल की उम्र में जब वह अपनी बिल्डिंग में बच्चों के साथ खेला करते थे तभी से उनमें सर्वश्रेष्ठ बनने की चाहत रहती थी। इसके लिए वह किसी भी चुनौती से कभी मुंह नहीं मोड़ते थे।

सचिन इसीलिए भी महान हैं कि, वह खुद को नहीं बल्कि क्रिकेट के खेल को महान मानते हैं। अपने स्कूली क्रिकेट खेलने के दिनों से आज तक क्रिकेट के प्रति समर्पण, अनुशासन और जुनून को उन्होंने कम नहीं होने दिया है। वह जीतना चाहते हैं और इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं। हारना तो वह अपने बेटे के साथ खेलते हुए भी पसंद नहीं करते। टीम भावना में विश्वास रखते हैं और आलोचना पर घबराते नहीं बल्कि उनके इरादे और दृढ़ हो जाते हैं। उनका स्वभाव ही ऐसा है कि, जो कोई भी उनसे मिलता है खुश होकर यह सोच इतराते हुए जाता है कि वह इतिहास का हिस्सा बन गया है। 

इन तमाम गुणों के बिना वह दो दशक तक किसी बादशाह की तरह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टिके नहीं रह सकते थे। राहुल द्रविड़ ने सचिन की खूबियों को सलाम करते हुए कहा, ‘सचिन ने मैदान के अंदर और बाहर जो अनुशासन दिखाया वह महत्वपूर्ण है। अनुशासन और क्रिकेट के प्रति प्यार और जुनून की वजह से ही वह इतने साल क्रिकेट खेल सके हैं। इसके बिना भारत में 20 साल तक खेल पाना आसान नहीं है।’ खुद सचिन का भी कहना है कि, ‘मैंने जब पहली बार क्रिकेट का बल्ला थामा था, उस दिन जो प्यार और जुनून इस खेल के प्रति था वह आज भी कायम है।’ सचिन को क्रिकेट जगत में भगवान का दर्जा इसलिए दिया गया है। वह ऐसे शख्स हैं जो साथी खिलाड़ियों ही नहीं बल्कि विपक्षी क्रिकेटरों की भी मदद करने के लिए जाने जाते हैं। सचिन कोई सलाह दें, या विचार व्यक्त करें उसे खिलाड़ियों, क्रिकेट बोर्ड से लेकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद तक तुरंत स्वीकार कर लेती है। क्योंकि सचिन क्रिकेट के सबसे बड़े जीनियस हैं।

हालांकि यह जीनियस भी फेल हुआ है, असफलता देख चुका है। मायूसी और निराशा भी झेल चुका है। पीठ में तकलीफ से लेकर टेनिस एल्बो जैसी चोटों से भी खूब जूझा है। मुंबई के अखबारों ने बरसों अपने तेंदुल्या की शान में कसीदे गढ़ने के बाद ‘एंडुलकर’ शीर्षक भी लगाए। लेकिन सचिन तो सचिन हैं, उनसे हर मैच में रन बनाने की ऐसी उम्मीद रहती है जैसे वह कोई सुपरमैन, बैटमैन या स्पाइडरमैन हों। इसलिए एक-दो पारियों में उनके असफल होते ही चिंता शुरू हो जाती है। लेकिन सचिन 20 साल में हर बार अपने चाहने वालों की चिंता और विरोधियों की आलोचना की आग में तपकर कुंदन बनकर निकले हैं।

तेंदुलकर चाहते हैं कि वह ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किए जाएं, जो टीम के लिए खेला और जो टीम का सच्चा, निष्पक्ष और ईमानदार सदस्य था। एक ऐसा व्यक्ति जो जिसने टीम को अपना सब कुछ दिया और टीम के लिए सब कुछ करना चाहता था। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके टीम में रहते भारतीय टीम विश्व कप विजेता बने।
इंशाअल्लाह, महान क्रिकेटर की यह महान इच्छा जरूर पूरी हो!                  

"सचिन मैं तुम्हारी बहुत बड़ी फैन हूं। हालांकि मैं क्रिकेट के बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं जानती हूं, लेकिन जब तुम्हें बैटिंग करते देखती हूं तो टेलीविजन सेट से चिपक जाती हूं। तुम्हें पता है, अक्सर मैं नहाना और खाना खाना तक भूल गई।" -लता मंगेशकर

"कई बार टीवी पर उसके बल्ले के करिश्मे देखने में इतना तल्लीन हो गया कि शूटिंग पर देर से पहुंचा। वह जीनियस है और उतना ही विनम्र इन्सान भी। सचिन का यह कहना कि बचपन से वह मेरा फैन रहा है, उसकी महानता है।" -अमिताभ बच्चन

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सचिन के अनोखे किस्से.....

.....तो टेनिस खिलाड़ी बन जाते सचिन
सचिन तेंदुलकर बचपन से अमेरिका के महान टेनिस खिलाड़ी जॉन मैकनरो के फैन रहे हैं। उनके साथ के कुछ लड़के स्वीडन के महान सितारे ब्योन बोर्ग के फैन थे। विंबलडन प्रतियोगिता के मैच टीवी पर देखते हुए बोर्ग के समर्थकों से खूब लड़ते थे मैकनरो के फैन सचिन। उन्हें बचपन के साथी मैक भी कहते थे। वह मैकनरो की तरह लंबे बाल रखने लगे थे, माथे पर बैंड पहनते थे। वो तो शुक्र है कि टेनिस खेलने के लिए कोर्ट की जरूरत पड़ती है, जो उनकी बिल्डिंग में उपलब्ध नहीं था। जबकि स्टंप लगाकर बैट उठाकर टेनिस बॉल से क्रिकेट वहां खेली जा सकती थी। बस इसी वजह से टेनिस के बजाए क्रिकेटर बन गए सचिन।

गरीब और विकलांग बच्चों की मदद में भी आगे
सचिन की सास अन्नाबेल मेहता मुंबई के एक एनजीओ ‘अपनालय’ से जुड़ी हैं। इसके जरिए सचिन हर साल 200 गरीब बच्चों को प्रायोजित करते हैं। इसके अलावा भी वह समय-समय पर गरीब, विकलांग और मंदबुद्धि बच्चों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। बड़े प्यार से उनसे बात करते हैं और वे जिस राज्य या शहर के हों, उन्हें मैच देखने का न्यौता भी देते हैं।
 
एक बार मुंबई में चंडीगढ़ से आए एक बच्चें ने बड़े प्यार से पूछा था कि हम आपका मैच कैसे देखें, हमारे पास टिकट खरीदने के लिए रुपए नहीं हैं। तब सचिन ने कहा था, ‘जब मोहाली में मैच होगा तो आप स्टेडियम में आना और बताना कि मैंने बुलाया है, मैं आपको टिकट दूंगा।’
 
स्कूल से ड्रेसिंग रूम तक होपिंगो/बैटिंगो
सचिन तेंदुलकर को यह खेल बहुत पसंद है। इसे होपिंगो/बैटिंगो कहा जाता है। इसमें यह तय है कि अगर आपका कोई साथी स्कीट पर उठते-बैठते होपिंगो/बैटिंगो नहीं कहता है तो आपके पास यह अधिकार होगा कि आप उसकी पिटाई कर सकें। सचिन के नजदीकी दोस्तों के अनुसार वह अपने खास साथियों के साथ भारतीय टीम के ड्रेसिंग रूम में आज भी होपिंगो/बैटिंगो खेलते हैं।

तेंदुलकर टेबल टेनिस में भी कम नहीं
सचिन तेंदुलकर दाएं हाथ से बल्लेबाजी और गेंदबाजी करते हैं। वह टेबल टेनिस भी बहुत अच्छी खेलते हैं और वो भी दोनों हाथों से। अपने को रैकेट गेम का अच्छा खिलाड़ी मानने वाले लिएंडर पेस एक बार उनके साथ टेबल टेनिस खेल उनका जलवा देख चुके हैं। दोनों ने 30 गेम खेले और पेस केवल दस में ही जीत पाए। इसके बाद पेस की टिप्पणी थी कि, ‘सचिन किसी भी खेल में होते वह विश्व स्तरीय ही होते। क्रिकेट अन्य खेलों से लकी रहा है।’

कभी रनर नहीं लेते सचिन
सचिन तेंदुलकर अपने स्कूली क्रिकेट के दिनों से कभी रनर नहीं लेते। उनका कहना है कि, ‘जब मैं शॉट मारता हूं तो मैं ही यह जानता हूं कि गेंद कहां जा रही है और कितनी तेजी से जा रही है। यह ऐसी चीज है जिसे मेरा रनर कभी नहीं जान सकता।’

गावसकर के पैड और अंधविश्वास
सचिन तेंदुलकर को महान क्रिकेटर सुनील गावसकर ने एक जोड़ी पैड दिए थे। जब सचिन ने 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ पहला टेस्ट खेला तो वही पैड पहने थे। वह पैड पहनने के मामले में अंधविश्वासी हैं और हमेशा बाएं पैर पर पहले पैड बांधते हैं। -रीमिक्स टीम

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सचिन की कुंडली

जन्म- 24 अप्रैल, 1973
समय- दोपहर 2:35 बजे
स्थान- मुंबई (महाराष्ट्र)

15 अक्टूबर, 2009 से 15 अक्टूबर, 2012 तक राहु दशा में शुक्र की अंतर्दशा लगी है। यह सचिन को खेल में महत्वपूर्ण उपलब्धि, नए कीर्तिमान, बड़ा आर्थिक लाभ, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार की प्राप्ति कराएगी, किन्तु समय-समय पर स्वास्थ्य विशेषकर चोट, छोटी दुर्घटना, पेट एवं हड्डी की समस्या खेल की निरंतरता को प्रभावित करेगी।

हाल में हुए भारत-आस्ट्रेलिया सीरिज के दौरान सचिन तेंदुलकर ने सत्रह हजार रनों का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। तेंदुलकर एक दिवसीय क्रिकेट में 45 शतक के साथ 17 हजार रन और टेस्ट क्रिकेट में 42 शतक व 12 हजार रन से ज्यादा रन बनाने वाले इकलौते खिलाड़ी हैं। तेंदुलकर ने हैदराबाद में 141 गेंदों पर 19 चौके और 4 छक्के की मदद से 175 रनों की विशाल पारी खेलकर एकबार फिर से अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट का इकलौता बादशाह होने का प्रमाण दिया है। हांलाकि भारत-आस्ट्रेलिया से एक दिवसीय सीरिज हार चुका है। किन्तु तेंदुलकर ने अपनी बढ़ती उम्र को दरकिनार कर बल्ले से जलवा दिखाया।

पिछले हफ्ते क्रिकेट विश्वकप-2011 (19 फरवरी से 2 अप्रैल, 2011) के कार्यक्रम की घोषणा की जा चुकी है। सभी की निगाहें सचिन तेंदुलकर पर टिकी हैं। भारतीय टीम में सबसे सीनियर होने के नाते तेंदुलकर की भूमिका कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में आइए आज ज्योतिषशास्त्र के माध्यम से यह मालूम करें कि इतिहास पुरुष बन चुके तेंदुलकर का भविष्य कैसा है? अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट में वे कब तक बने रहेंगे? क्या तेंदुलकर का स्वास्थ्य बड़ी कामयाबी दिलाने में साथ निभाएगा? आइए इन सवालों के जबाव जानने के लिए एक नजर इनकी कुंडली पर डालते हैं।
 
एस्ट्रोलॉजिकल प्रोफाइल

सचिन तेंदुलकर का जन्म 24 अप्रैल, 1973 को सिंह लगन तथा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र की चतुर्थ चरण अर्थात धनु राशि में हुआ है। कुड़ली में लगनेश सूर्य एवं पराक्रमेश, कर्मेश, शुक्र की भाग्य में युति से उत्तम केन्द्र त्रिकोण राजयोग व ऊत्कृष्ट खिलाड़ी योग बना है। सुरवेश, भाग्येश मंगल तथा पंचमेश बृहस्पति की युति से उत्तम महाभाग्य एवं अखंड साम्राज्य योग बना है। छठे भाव में उच्च राशि का मंगल शत्रुहंता योग बना रहा है। केन्द्र-त्रिकोण व उत्कृष्ट खिलाड़ी योग ने तेंदुलकर को क्रिकेट की दुनिया का इकलौता ध्रुवतारा बनाया। अखंड-साम्राज्य योग ने सभी रिकॉर्ड तेंदुलकर के नाम किए जिसे तोड़ पाना किसी अन्य खिलाड़ी के लिए असंभव सा होगा।

शत्रुहंता योग ने उन्हें दुनिया के तमाम दिग्गज गेंदबाजों की धुनाई करने वाला और विरोधियों से भी अपनी तारीफ करवाने वाला बनाया। इसके विपरीत चन्द्र राहु युति से बने ग्रहण योग तथ सर्पश्रप दोष ने समय-समय पर स्वास्थ्य की समस्या, टेनिस एल्बो, खेल के दौरान चोट, विवाद, खेल में उतार-चढाव भी दिए और एक कप्तान के रूप में बड़ी सफलता नहीं लेने दी।
 
आने वाला कल
तेंदुलकर का भविष्य उज्ज्वल है। वर्तमान समय 15 अक्टूबर, 2009 से 15 अक्टूबर, 2012 तक राहु दशा में शुक्र की अंतर्दशा लगी है। यह सचिन को खेल में महत्वपूर्ण उपलब्धि, नए कीर्तिमान, बड़ा आर्थिक लाभ, राष्ट्रीय-अतराष्ट्रीय पुरस्कार की प्राप्ति कराएगी, किन्तु समय-समय पर स्वास्थ्य विशेषकर चोट, छोटी दुर्घटना, बुखार, पेट एवं हड्डी की समस्या खेल की निरंतरता को प्रभावित करेगी।
 
केंद्र-त्रिकोण एवं उत्कृष्ट खिलाड़ी योग में शामिल शुक्र भी अंतर्दशा (15 अक्टूबर, 2012 तक) में सचिन अभी और ऐसे नए कीर्तिमान व शतक बनाएंगे जिसे, तोड़ पाना दुनिया के किसी खिलाड़ी के लिए संभव नहीं होगा। इनके सितारों की माने तो ये श्रीलंका के विस्फोटक बल्लेबाज सनथ जयसूर्या की तरह अपनी उम्र के चालीस वर्ष तक अर्थात 24 अप्रैल, 2013 तक खेल सकते हैं।
 
किन्तु पहले की तरह सभी मैचों में एक जैसे प्रदर्शन की निरंतरता नहीं रहेगी। कुछ मैच के अतंराल पर एक विस्फोटक पारी व टीम इंडिया के संकटमोचक की भूमिका में नजर आते रहेंगे। बल्ले के साथ गेंदबाजी में भी कुछ नए रिकॉर्ड अपने नाम करेंगे। खेल मैदान से बाहर बड़ा आर्थिक करार, विज्ञापन एवं सामाजिक कार्यों के माध्यम से छाए रहेंगे। अगामी वर्षों में जून से अगस्त 2010/12 नवंबर, 2010 से 15 अप्रैल, 2011 तथा 18 सितंबर 2011 से 11 जनवरी, 2012 की अवधि तेंदुलकर के स्वास्थ्य एवं खेल जीवन की प्रभावित करने वाली होगी। अब तक पांच विश्वकप में खेल चुके सचिन अपना आखिरी विश्वकप 2011 (19 फरवरी से 2 अप्रैल, 2011) में खेलेंगे।

इस दौरान सचिन 12 नवंबर, 2010 से 25 अप्रैल, 2011 तक राहु दशा-शुक्र अंतर्दशा एवं राहु के प्रत्यान्तर में रहेंगे। ग्रहण व सर्पश्रप दोष में शामिल राहु पुन: सचिन के विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा बनने के सपने पर ग्रहण लगा सकता है। इस संदर्भ में तेंदुलकर द्वारा जून, 2006 की तरह एक बार फिर से सर्पश्रप दोष की शांतिपूजा करा लेना अत्यंत शुभ साबित हो सकता है। - समीर उपाध्याय

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