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20 साल से वही जुनून

20 साल से वही जुनून

इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान दक्षिण अफ्रीका के छोटे से शहर ईस्ट लंदन में शाहरुख खान की कोलकाता नाइटराइडर्स प्रैक्टिस कर रही थी। मुंबई इंडियंस की प्रैक्टिस खत्म हुई थी और सचिन तेंदुलकर अपने बेटे अर्जुन के साथ मैदान पर थे। मैंने अर्जुन से पूछा आपका फेवरेट क्रिकेटर कौन है? उम्मीद थी कि जवाब मिलेगा सचिन तेंदुलकर, लेकिन कानों में आवाज गूंजी- क्रिस गेल! मैं एकदम से चौंक गया। जो तेंदुलकर दुनिया भर के करोड़ों क्रिकेटरों के फेवरेट हैं, वह क्रिकेटर बनने के लिए मैदान में पसीना बहाना शुरू कर चुके अपने 9 साल के बेटे के फेवरेट नहीं हैं।

मैंने पूछा गेल क्यों फेवरेट हैं? अर्जुन ने तपाक से कहा, ‘क्योंकि वह अच्छी बल्लेबाजी करते हैं।’ यह सुनकर मैं फिर चौंका और यह सोचने लगा कि क्या सचिन तेंदुलकर इतनी अच्छी बल्लेबाजी नहीं करते कि उनके बेटे के फेवरेट हो सकें। हल्की सी उम्मीद के साथ कि शायद इस बार जवाब में सचिन का नाम सुनने को मिले, मैंने पूछा गेल के अलावा कौन सा बल्लेबाज पसंद है? उम्मीद थी कि शायद अब तो अर्जुन की जुबान से निकलेगा- मेरे पापा या सचिन तेंदुलकर। लेकिन जवाब मिला, ‘एडम गिलक्रिस्ट।’

दो साल पहले मैं मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक रणजी मैच के दौरान देख चुका था कि कैसे सचिन के आउट होने पर निराश हुए अर्जुन ने बालपन में मचलते हुए पूछा था, ‘क्या पापा अब और बैटिंग नहीं करेंगे?’ उस दिन मुझे लगा था कि सचिन के अलावा अर्जुन किसी और बल्लेबाज को पसंद नहीं कर सकता। लेकिन समय बीता और अर्जुन अपने पापा के साथ देश-विदेश के मैदानों में क्रिकेट की दुनिया के तमाम सितारों को खेलते हुए देखने लगा और क्रिस गेल और एडम गिलक्रिस्ट का फैन हो गया। यह दर्शाता है कि सचिन अपने बेटे पर अपने विशाल व्यक्तित्व की आभा छोड़ने की बजाए उसकी अपनी पसंद-नापसंद के लिए खुला आकाश देने में विश्वास रखते हैं। जबकि, कुछ सप्ताह पहले सुनील गावसकर ने ‘एचटी समिट’ में कहा था कि, ‘पिछले बीस साल से हर मां-बाप अपने बच्चों को सचिन तेंदुलकर बनाना चाहते हैं। यह बात किसी भी रिकॉर्ड और उपलब्धि से बढ़कर है।’
 
इस पर बहुत खोजबीन की जाती रही है कि सचिन कैसे इतने महान क्रिकेटर बने हैं? तेंदुलकर सिर्फ इसलिए महान नहीं माने जाते कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हजारों रन बनाए और दजर्नों विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अनेक मील के पत्थर स्थापित किए हैं। वह महान हैं, क्योंकि उनके अंदर बचपन से ही सर्वश्रेष्ठ बनने की चाह रही है और इसके लिए वह किसी भी चुनौती से भागे नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। क्रिकेट के प्रति पूरी तरह समर्पित जीवन बिताया।

पिता रमेश तेंदुलकर महान संगीतकार और गायक सचिन देवबर्मन के मुरीद थे, इसलिए अपने छोटे बेटे का नाम उन्होंने सचिन रखा था। शायद उन्होंने सोचा होगा कि उनका सचिन भी बड़ा होकर संगीत की दुनिया में नाम कमाएगा। लेकिन जब सचिन की क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखी तो बेटे को खूब प्रोत्साहित किया, इस संदेश के साथ कि, ‘जिंदगी में कितने भी उतार-चढ़ाव आएं शॉर्ट कट कभी मत अपनाओ।’ बड़े भाई अजित ने सचिन के क्रिकेट करियर को संभालने की कमान संभाली। अपने शारदाश्रम विद्यामंदिर के कोच रामाकांच अचरेकर के स्कूटर की पिछली सीट में बैठ एक दिन में कई मैदानों पर बल्लेबाजी की। सचिन के शब्दों में,‘ दूसरे साल जब मैंने इंटर स्कूल क्रिकेट में पहला शतक जमाया तो मुझे लगा था कि यह स्पेशल है और अगर मैं इसी तरह से लगातार करता रहा तो चीजें बदल सकती हैं।’

सचिन का वह शतक ही स्पेशल नहीं था, बल्कि उनकी हर पारी स्पेशल होती चली गई थी। जल्दी ही सबकी समझ में आ गया था कि, सचिन एक स्पेशल टेलेंट हैं। सचिन की सोच भी हमेशा से स्पेशल रही है। एक बार अपनी सफलता के मंत्र की तरफ हल्का सा इशारा करते हुए कहा था कि, ‘जिंदगी में सफल वो लोग होते हैं जो चुनौतियों को आगे बढ़कर स्वीकार करते हैं। जो चुनौतियों से भागते हैं, वो कभी शिखर पर नहीं पहुंच सकते।’ इसीलिए सचिन बचपन से ही हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। आठ-दस साल की उम्र में जब वह अपनी बिल्डिंग में बच्चों के साथ खेला करते थे तभी से उनमें सर्वश्रेष्ठ बनने की चाहत रहती थी। इसके लिए वह किसी भी चुनौती से कभी मुंह नहीं मोड़ते थे।

सचिन इसीलिए भी महान हैं कि, वह खुद को नहीं बल्कि क्रिकेट के खेल को महान मानते हैं। अपने स्कूली क्रिकेट खेलने के दिनों से आज तक क्रिकेट के प्रति समर्पण, अनुशासन और जुनून को उन्होंने कम नहीं होने दिया है। वह जीतना चाहते हैं और इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं। हारना तो वह अपने बेटे के साथ खेलते हुए भी पसंद नहीं करते। टीम भावना में विश्वास रखते हैं और आलोचना पर घबराते नहीं बल्कि उनके इरादे और दृढ़ हो जाते हैं। उनका स्वभाव ही ऐसा है कि, जो कोई भी उनसे मिलता है खुश होकर यह सोच इतराते हुए जाता है कि वह इतिहास का हिस्सा बन गया है। 

इन तमाम गुणों के बिना वह दो दशक तक किसी बादशाह की तरह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टिके नहीं रह सकते थे। राहुल द्रविड़ ने सचिन की खूबियों को सलाम करते हुए कहा, ‘सचिन ने मैदान के अंदर और बाहर जो अनुशासन दिखाया वह महत्वपूर्ण है। अनुशासन और क्रिकेट के प्रति प्यार और जुनून की वजह से ही वह इतने साल क्रिकेट खेल सके हैं। इसके बिना भारत में 20 साल तक खेल पाना आसान नहीं है।’ खुद सचिन का भी कहना है कि, ‘मैंने जब पहली बार क्रिकेट का बल्ला थामा था, उस दिन जो प्यार और जुनून इस खेल के प्रति था वह आज भी कायम है।’ सचिन को क्रिकेट जगत में भगवान का दर्जा इसलिए दिया गया है। वह ऐसे शख्स हैं जो साथी खिलाड़ियों ही नहीं बल्कि विपक्षी क्रिकेटरों की भी मदद करने के लिए जाने जाते हैं। सचिन कोई सलाह दें, या विचार व्यक्त करें उसे खिलाड़ियों, क्रिकेट बोर्ड से लेकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद तक तुरंत स्वीकार कर लेती है। क्योंकि सचिन क्रिकेट के सबसे बड़े जीनियस हैं।

हालांकि यह जीनियस भी फेल हुआ है, असफलता देख चुका है। मायूसी और निराशा भी झेल चुका है। पीठ में तकलीफ से लेकर टेनिस एल्बो जैसी चोटों से भी खूब जूझा है। मुंबई के अखबारों ने बरसों अपने तेंदुल्या की शान में कसीदे गढ़ने के बाद ‘एंडुलकर’ शीर्षक भी लगाए। लेकिन सचिन तो सचिन हैं, उनसे हर मैच में रन बनाने की ऐसी उम्मीद रहती है जैसे वह कोई सुपरमैन, बैटमैन या स्पाइडरमैन हों। इसलिए एक-दो पारियों में उनके असफल होते ही चिंता शुरू हो जाती है। लेकिन सचिन 20 साल में हर बार अपने चाहने वालों की चिंता और विरोधियों की आलोचना की आग में तपकर कुंदन बनकर निकले हैं।

तेंदुलकर चाहते हैं कि वह ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किए जाएं, जो टीम के लिए खेला और जो टीम का सच्चा, निष्पक्ष और ईमानदार सदस्य था। एक ऐसा व्यक्ति जो जिसने टीम को अपना सब कुछ दिया और टीम के लिए सब कुछ करना चाहता था। उनकी हार्दिक इच्छा है कि उनके टीम में रहते भारतीय टीम विश्व कप विजेता बने।
इंशाअल्लाह, महान क्रिकेटर की यह महान इच्छा जरूर पूरी हो!                  

"सचिन मैं तुम्हारी बहुत बड़ी फैन हूं। हालांकि मैं क्रिकेट के बारे में बहुत ज्यादा तो नहीं जानती हूं, लेकिन जब तुम्हें बैटिंग करते देखती हूं तो टेलीविजन सेट से चिपक जाती हूं। तुम्हें पता है, अक्सर मैं नहाना और खाना खाना तक भूल गई।" -लता मंगेशकर

"कई बार टीवी पर उसके बल्ले के करिश्मे देखने में इतना तल्लीन हो गया कि शूटिंग पर देर से पहुंचा। वह जीनियस है और उतना ही विनम्र इन्सान भी। सचिन का यह कहना कि बचपन से वह मेरा फैन रहा है, उसकी महानता है।" -अमिताभ बच्चन

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