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वह मासूम सी मुस्कान अब भी है

वह मासूम सी मुस्कान अब भी है

मैंने सचिन को पहली बार अंडर 15 के नेशनल कैंप में देखा था। यह कैंप इंदौर में वासु परांजपे की देखरेख में हो रहा था। तब उनके बाल काफी घने थे। उन्हें देख कर श्रीसत्य साई बाबा की याद आती थी। हालांकि सालों साल टीम इंडिया का हेलमेट पहनते हुए और उम्मीदों के बोझ तले उनके बाल कम हो गए हैं, लेकिन मासूम सी मुसकान और चेहरे पर संतुष्टि का भाव अब भी बना हुआ है। उन्हें बैटिंग करना बेहद पसंद था। वह घंटों नेट में बैटिंग करते रहते। परांजपे सर को उन्हें जबर्दस्ती नेट से हटाना पड़ता था। मैं जब कैंप में आया तो सचिन के बारे में काफी कुछ सुना था। लेकिन जब मैंने खेलते देखा तो समझ गया कि वह तो स्पेशल टेलेंट है। और देश के लिए लंबा खेलना है। उस उम्र में भी वह तीन पाउंड के भारी बैट से खेलते थे।

पाकिस्तान के खिलाफ 16 साल की उम्र में पहला टेस्ट खेलने के बाद वह आगे ही आगे बढ़ते गए। लेफ्टी होने के नाते मैं लारा का फैन हूं लेकिन सचिन उससे भी ऊपर हैं। वह बहुत ही साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आए थे। उनके पिता प्रोफेसर थे। उनके जीवन मूल्य बेहद सीधे सादे थे। शायद इसीलिए वह कहीं भी पहुंच गये हों, उनके पांव हमेशा जमीन पर ही टिके रहते हैं।

मेरा पहला विदेशी दौरा 1991 में ऑस्ट्रेलिया का था। उसमें मैं और सचिन एक ही कमरे में थे। मुझे यह देखकर हैरत होती थी कि अगले दिन बैटिंग करनी है और वह देर रात तक टीवी देख रहे हैं।  मैंने पूछा था कि वह क्यों नहीं सो जाते? उनका जवाब था कि वह क्रीज पर जाने के लिए नर्वस होते हैं। इसीलिए नींद ही नहीं आती।
 आमतौर पर सचिन खुश रहते हैं। मैंने उन्हें एक ही बार परेशान देखा, जब वह कप्तान बने। वह कभी रिलेक्स नहीं रह सके। बाद में उन्होंने कप्तानी छोड़ दी। मेरे खयाल से वह बेहतरीन फैसला था। उन्हें खेलते हुए 20 साल हो गए। इतना लंबा वक्त खेलना बहुत बड़ी बात है। अब सचिन जितना भी खेलना चाहें उन्हें खेलने देना चाहिए। अच्छी टीम होने के बावजूद पिछला वर्ल्ड कप हम बेहद खराब खेले थे। मेरी तमन्ना है कि वह अगला वर्ल्ड कप खेलें और टीम इंडिया को चैपियन बनाएं।

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