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जजों को जनता की कसौटी पर नहीं रखा जा सकता

जजों को जनता की कसौटी पर नहीं रखा जा सकता

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि न्यायाधीशों को जनता की कसौटी पर नहीं रखा जा सकता क्योंकि यह उनके कामकाज और उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित करेगा।

उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री की ओर से अटार्नी जनरल गुलाम ई वाहनवती ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष दावा किया, हम अपने न्यायाधीशों को जनता की कसौटी पर या जांच के दायरे में नहीं रख सकते क्योंकि इससे उनका कामकाज और उनकी स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

यह दलील उच्च न्यायालय की एकल पीठ के उस फैसले को चुनौती देते हुए दी गई जिसमें कहा गया था कि प्रधान न्यायाधीश का पद सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में आता है और न्यायाधीशों को अपनी संपत्ति का खुलासा करना चाहिए। अटार्नी जनरल ने दावा किया कि अन्य एजेंसियों को न्यायपालिका में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

उन्होंने मुख्य न्यायाधीश एपी शाह की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष कहा कि न्यायाधीशों को जनता की धारणा के आधार पर परखा नहीं जा सकता। न्यायपालिका को तीसरे पक्ष के लिए नहीं खोला जा सकता। व्यवस्था में बेहतर पारदर्शिता और जवाबदेही में कोई समस्या नहीं है लेकिन यह व्यवस्था के अंदर से आना चाहिए।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने दो सितंबर के अपने फैसले में कहा था कि सीजेआई लोक प्राधिकार हैं और उनका पद आरटीआई अधिनियम के दायरे में आता है। यह फैसला प्रधान न्यायाधीश के जी बालकृष्णन के उस रुख के विपरीत था जिसमें वह लगातार कहते रहे कि उनका पद आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर है।

अटार्नी जनरल ने दावा किया कि 1997 में न्यायाधीशों द्वारा अपनी संपत्ति का प्रधान न्यायाधीश के समक्ष खुलासा करने के संबंध में पारित प्रस्ताव गैर वैधानिक और गैर बाध्यकारी था तथा यह किसी न्यायाधीश को प्रधान न्यायाधीश के समक्ष संपत्ति का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों द्वारा स्वेच्छा से अपनी संपत्ति का खुलासा करने के बावजूद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अपनी संपत्ति का ब्योरा देने से इंकार कर सकते हैं क्योंकि प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है। हालांकि, अदालत ने कहा कि 1997 का प्रस्ताव न्यायपालिका की ओर से न्यायिक जवाबदेही को हकीकत का रूप देना था और मैं नहीं मानता कि कोई भी न्यायाधीश यह कहेगा कि वह इस प्रस्ताव को नहीं मानेगा।

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