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नेहरू राष्ट्रीय-दृष्टिकोण के कारण बने पहले पीएम

नेहरू राष्ट्रीय-दृष्टिकोण के कारण बने पहले पीएम

देश के इतिहास में एक ऐसा मौका भी आया था, जब महात्मा गांधी को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू में से किसी एक का चयन करना था। लौह पुरुष के सख्त और बागी तेवर के सामने नेहरू का विनम्र राष्ट्रीय दृष्टिकोण भारी पड़ा और वह न सिर्फ इस पद पर चुने गए, बल्कि उन्हें सबसे लंबे समय तक विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र की बागडोर संभालने का गौरव हासिल भी हुआ।

भारत की राजनीतिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी पुस्तक- भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को बखूबी पेश करती है। विशेषज्ञों की राय में उनके इसी नजरिये के कारण राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें इस पद के लिए प्राथमिकता दी थी।

पंडित नेहरू की इसी कृति पर 52 कड़ियों का विशाल धारावाहिक बना चुके प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस बारे में कहा कि नेहरू का दृष्टिकोण पूरी तरह राष्ट्रीय था। यह बात उनकी प्रसिद्ध कृति से भी साबित होती है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी इस बात को समझते थे कि नेहरू का नजरिया राष्ट्रीय है। इसी वजह से उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के पद के लिए सरदार वल्लभ भाई पटेल की तुलना में नेहरू को अधिक प्राथमिकता दी। प्रख्यात फिल्मकार ने मुंबई से फोन पर कहा कि 1946 में जब कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव हो रहा था, तो यह बात तय थी कि जो यह पद जीतेगा वही भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा। इस पद पर पटेल और नेहरू खड़े होने वाले थे। कोई बड़ी बात नहीं थी कि इस चुनाव में पटेल जीत जाते लेकिन, महात्मा गांधी ने नेहरू के राष्ट्रीय नजरिये को देखते हुए पटेल को इस चुनाव से हटने के लिए मना लिया।

बेनेगल ने कहा कि 'भारत एक खोज' नेहरू जी ने अहमदनगर जेल में लिखी थी। उन्होंने कहा कि यह चूंकि आजादी से पहले लिखी गई थी लिहाजा, इसमें नेहरू के सामने वे सवाल थे जो भारत के समक्ष स्वतंत्रता के बाद आने वाले थे। उन्होंने कहा कि राष्ट्र राज्य की धारणा पश्चिम से आई थी। इस धारणा के तहत किसी भी देश के राष्ट्रीय राज्य होने के लिए तीन शर्तें होती हैं। जैसे- एक नस्ल, एक धर्म, एक भाषा। लेकिन, भारत के समक्ष यह समस्या है कि देश में न तो एक भाषा है, न एक धर्म और न ही एक नस्ल।
  
नेहरू ने भारत एक खोज के जरिए पश्चिमी इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के समक्ष यह बात साबित की है कि पारंपरिक परिभाषा पर खरा नहीं उतरने के बावजूद भारत एक राष्ट्र राज्य है। भारत एक खोज के जरिए नेहरू ने यह साबित किया है कि भारत की विशेषता अनेकता में एकता है। इसी के कारण वह सच्चे मायनों में राष्ट्र राज्य है।

पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के अनुसार, पंडित नेहरू ने भारत एक खोज में जिन पारंपरिक मूल्यों की चर्चा की उसी के आधार पर देश में शिक्षा, धर्मनिरपेक्षता और विदेश नीति की नींव रखी गई। उनके बाद इंदिरा गांधी ने इन नीतियों को और मजबूती दी। सिंह ने कहा कि नेहरू ने भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए विदेश-नीति तैयार की थी। आजादी के साठ साल तक नेहरू की बनाई विदेश-नीति पर कमोबेश हर सरकार चलती रही। लेकिन, मौजूदा मनमोहन सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु करार करके नेहरू द्वारा बनाई गई विदेश-नीति को छोड़ दिया है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया की चर्चा करते हुए वरिष्ठ नेता नटवर सिंह ने कहा कि निःसंदेह यह कृति उत्कृष्ट साहित्य का नमूना है। हालांकि यह बात दीगर है कि कई लोग इसके इतिहास संबंधी कुछ अंशों से सहमत नहीं है।

हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने अपनी रचना डिस्कवरी ऑफ इंडिया में भारतीय इतिहास की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। उसे श्याम बेनेगल ने 'भारत की खोज' के जरिए वातावरण के माहौल में ढालने का प्रयास किया था। यह सांस्कृतिक और साहित्यिक हिसाब से अच्छा प्रयास किया गया था। यादव के अनुसार, साहित्यिक रचनाओं पर फिल्में बनाने के कई प्रयास किए गए हैं और 100 से ज्यादा साहित्यिक रचनाओं पर फिल्में बनी हैं और मूलपाठ के हिसाब से देखें तो अधिकतर असंतोषजनक रही हैं। लेकिन, अगर स्वतंत्र रूप से उन फिल्मों को देखें तो स्पष्ट होगा कि कई फिल्में वाकई बेहतरीन रही हैं।

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज के अनुसार, डिस्कवरी आफ इंडिया पर आधारित भारत की खोज अच्छा सीरियल था और श्याम बेनेगल की कृति 'वेल रिसर्च' पर आधारित थी। बेनेगल का वह बढ़िया प्रयास था। जब उसे पहली बार प्रसारित किया गया, तो उस समय दर्शकों के पास विकल्प बहुत नहीं था। उसे मिली प्रतिक्रिया अच्छी थी। दर्शकों को भी वह पसंद आयी थी। भारद्वाज के अनुसार, इस क्षेत्र में ऐसे और भी प्रयास किए जाने चाहिए।

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