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बहुत तकलीफ देता है नवम्बर

अपने इतिहास में नवंबर सबसे दुखद महीनों में गिना जाएगा। नवंबर 84 की वजह से वह दुखद हुआ। महीना शुरू होने से एक दिन पहले इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। फिर क्या था सिखों पर आफत टूट पड़ी। उन बेचारों का हत्या से क्या मतलब था? उत्तर भारत से लेकर कर्नाटक तक पांच हजार सिखों को मार डाला गया था।

क्या उस ट्रेजेडी से हमने कोई सबक लिया? नहीं, बिल्कुल नहीं। सबसे पहले जरा इंदिरा गांधी की हत्या को देखते हैं। जहां तक मैं समझता हूं इंदिरा जी स्वर्ण मंदिर में आर्मी लगाए जाने के खिलाफ थीं। इसके बावजूद कि अकाल तख्त में भिंडरांवाले और उनके गुंडे कब्जा जमाए बैठे थे। लेकिन उनके सलाहकारों ने मजबूर कर दिया कि वह आर्मी का इस्तेमाल करें। ये लोग सिखों और उनके इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे यह भी नहीं समझते थे कि स्वर्ण मंदिर का सिखों के लिए क्या मतलब है? उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि पूरा ऑपरेशन दो घंटे में खत्म हो जाएगा। भिंडरांवाले जब जान जाएंगे कि टैंकों वगैरह से घिर गए हैं, तो वह आत्मसमर्पण कर देंगे।
 
लेकिन हुआ कुछ और ही था। पूरे दो दिन लग गए थे उस लड़ाई के खत्म होने में। बहुत लोग मारे गए थे और भारी नुक्सान हुआ था। दो दिन के बाद इंदिरा जी ने जब मंदिर का दौरा किया था, तो वह सकते में आ गई थीं। वहां पवित्र सरोवर में लाशें तैर रही थीं। और अकाल तख्त बुरी तरह टूट फूट गया था। मार्क टली ने उसे ठीक ही ‘फैटल मिसकैलकुलेशन’ यानी घातक पूर्वानुमान कहा था। शायद तभी वह समझ गई थीं कि उनकी जिंदगी खतरे में है। इस ट्रेजेडी का एक और पहलू है। उसका जिक्र कम ही हुआ है। दरअसल, भिंडरांवाले ने हिंदुओं के खिलाफ खूब जहर उगला था। उसके गुंडों ने बसों से उतार-उतार कर हिंदुओं को मार डाला था। इसके बावजूद अकालियों और कांग्रेसियों ने चुप्पी साधे रखी थी। कोई सिख नेता उनकी इस बदतमीजी के खिलाफ नहीं बोला। वे बुरी तरह डरे हुए थे। वे जानते थे कि भिंडरांवाले अपनी खिलाफत करने वालों का क्या करते हैं? वह तो एक ही रास्ता जानते थे, बस मार डालो।

मैं ये सब जानता हूं। इसलिए क्योंकि मैं सालों-साल उनकी हिट लिस्ट में था। उसकी वजह से सिखों के खिलाफ माहौल बना। शायद यही वजह थी कि जब सिखों पर हमला हुआ, तो बेहद कम लोग उनकी मदद को आगे आए। आज भी ये बात बाहर रहने वाले सिखों के जेहन में नहीं बैठी है। बाहर के कई गुरुद्वारों में भिंडरांवाले की तस्वीरें लगी हुई हैं। प्रवचन देने वाले उन्हें संत और शहीद कहते नहीं थकते। अब वह इतिहास हो चुका है। अभी जो बचा है वह नवंबर 84 के दंगाईयों को सजा देनी है। सैकड़ों दंगाईयों के खिलाफ गवाही हो चुकी है। लेकिन कुल 20 के ही खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है। मैं बार-बार कहता रहा हूं। फिर कह रहा हूं कि अगर दोषियों को सजा नहीं मिलती है, तो उससे अपराधियों को शह मिलती है और वे बढ़ते रहते हैं। आप मान लो कि अगर इन हत्यारों को सजा नहीं मिलेगी तो पीड़ितों में से कई लोग जुर्म करने को तैयार हो जाएंगे।
गुरुपर्व
उस दिन सोमवार था। दो नवंबर का दिन। सुबह-सुबह ही फोन की घंटी बजी। मुझे इधर सुनने में दिक्कत होने लगी है। इसलिए मैंने अपने नौकर बहादुर से सुनने को कहा। यह भी कहा कि पता करना कि कौन है और क्यों बात करना चाहता है? उसने सुना और कहा, ‘यह कराची से है।’ मैंने फोन उठाया और चिल्लाया, ‘मैं बहरा हो गया हूं। मुझे लिख कर क्यों नहीं दे देते?’ उन्होंने मुझे दोबारा बहादुर को फोन देने को कहा। मैंने उसे फोन पकड़ा दिया। बहादुर ने बताया, ‘किसी रजा साहब का फोन था। वह आपको गुरुपर्व की बधाई देना चाहते थे।’ तब मुझे खयाल आया कि अरे, आज तो गुरुपर्व है। गुरु नानक की जयंती है। लेकिन मैं बहुत खुश हुआ। पाकिस्तान के एक मुसलमान ने एक सिख को याद दिलाया कि उनके गुरु की जयंती है। ये ऐसा काम था जिसे खुद नानक साहब ने भी सराहा होता। वह तो दो अलग अलग किस्म के मजहबी लोगों के बीच प्यार और समझदारी का संदेश दे रहे थे। उनके पहले शिष्य भाई मरदाना थे। उन्होंने ही अपने गुरु के पदों को संगीत दिया था। वह हमेशा मुसलमान ही बने रहे। कराची से बधाई देने वाले रजा परवेज थे। वह सादिया देहलवी के पहले शौहर और अरमान के पिता हैं। सादिया अपने बेटे के साथ दिल्ली में रहती हैं। यह अजीब बात है कि रजा को मसजिद जाने में तकलीफ होती है। मुझे गुरुद्वारे जाने में परेशानी
होती है।

 

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