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नेहरू जी की आस्था

शांतिवन से रोज गुजरता हूं। नेहरूजी की समाधि मुझे अपील करती है। वक्त की वजह से भीतर नहीं जा पाता। लेकिन वहां जाने की इच्छा बनी रहती है। हरी-हरी घास पर बैठकर झील में तैरती प्यारी-प्यारी बतखों को देखना अच्छा लगता है। किसी दिन एक बच्चों को उन बतखों से खेलते देखा था। जब भी कभी नेहरूजी पर सोचता हूं, तो वह बच्चा याद आ जाता है।
कभी सोचता हूं कि चाचा नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस कैसे है? फिर मुझे लगता है कि उनके भीतर एक बच्चा था। और शायद उसी ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया। उनके हर काम में बच्चों जैसा जोश था। गुस्सा भी था, तो बच्चों जैसा ही। बच्चों की ही तरह वह जिंदगी से बेपनाह प्यार करते थे। और जिंदगी को आज में ही जी लेना चाहते थे। वह कहते थे, ‘इस जिंदगी के बाद क्या होता है, मेरा उसमें कोई भरोसा नहीं है। मैं तो इसी जिंदगी को मानता हूं। उसे बेहतर बनाने की कोशिश करता हूं।’ शायद इसीलिए वह बुद्ध से प्रभावित होते हैं। गौतम परलोक के सवालों से नहीं जूझते। वह इस जिंदगी के दुखों को दूर करने की सोचते हैं।
रूढ़िवादी अर्थों में नेहरूजी की आस्था खोजना मुश्किल काम है। उस मायने में तो वह नास्तिक थे। नास्तिक न भी कहें, पर संदेहवादी तो थे ही। वह सेकुलर थे। एक दौर में पश्चिमी अंदाज के ‘सेकुलर स्टेट’ को मानते थे। 1927 में उन्होंने अपने दोस्त सैयद महमूद को लिखा था, ‘धर्म की जायज और नाजायज औलादों के लिए मुझमें धीरज नहीं है।’ लेकिन बाद में वह सर्वधर्म समभाव के ठेठ भारतीय संस्करण के नजदीक चले गए।  ऑक्सफोर्ड के एक छात्र को जवाब देते हुए उन्होंने कहा था, ‘सेकुलर का मतलब है राज्य की ओर से हर धर्म को बराबर का संरक्षण।’ संगठित धर्मों से तो वह खौफ खाते हैं। लेकिन निजी धर्म के खिलाफ नहीं हैं। एक लोकतांत्रिक और बोलने की आजादी का हिमायती निजी धर्म के खिलाफ कैसे हो सकता है? नेहरूजी ‘आस्तिक’ तो नहीं हैं, लेकिन उनमें नैतिक मूल्यों के लिए बेचैनी है। उनके अपने आदर्श हैं मसलन लोकतंत्र, सेकुलर और शांति। अपने आदर्श और उन पर भरोसा यही नेहरूजी की आस्था है।

 

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