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कुदरती संतुलन

कुदरत के संतुलन के नियम का भी जवाब नहीं। वरना अगर दुनिया में केवल अमीर ही अमीर होते तो गरीबों को सूट करने वाले ढेर सारे काम कौन करता? तब उनके सपनों के महल को कौन ईंट-मिट्टी ढोकर आलीशान बंगले की शक्ल में ढालता। कौन तन्हाई के मारे उनके फूल-से कोमल बच्चों को एक अदद आया बनकर पालता। कौन साफ-सफाई करके उनके घर-आंगन को संवारता।
इसी तरह अगर सारे गरीब ही गरीब होते तो फिर अमीरों वाले काम भी कौन करता? कौन फिर लाखों का चुनावी चंदा देकर नेताओं को अपनी उंगलियों पर नचाता। उनकी इस मजबूरी का फायदा उठाकर कौन फिर जमाखेरी, कालाबाजारी और मनमानी रेट बढ़ोतरी करके जालिम महंगाई को सातवें आसमान पर पहुंचाता। कौन दो नंबर के काले धंधे कर-करके लाखों-करोड़ों के सरकारी टैक्स बचाता। कौन फिर बिल्डर बनकर मजदूर-कारीगरों की मेहनत-मजदूरी दबा-दबा कर उन्हें कंगाल बनाता। कौन अपनी कंपनियों में ठेकेदारी सिस्टम लागू करके वर्करों को खून के आंसू रुलाता। कौन शोषक होने का धर्म निभाता।

गलती से अगर सारे मर्द ही मर्द होते तब तो दुनिया का बंटाधार ही हो जाता। मुंबइया बॉलीवुड और हॉलीवुड तो जैसे कंगाल ही हो जाते। क्योंकि तब न्यूड सीन किस पर फिल्माए जाते? फैशन इंडस्ट्री की तो लुटिया ही डूब जाती। आखिर कौन बिकनी पहन कर रेम्प पर बेहूदगी से कमर लचकाता। एड गुरु बर्बाद हो जाते। अखबार और मैगजीन बंद हो जाते। जिस्म की नुमाइश फिर कौन करता? टीआरपी कैसे बढ़ती? यह दुनिया बेदम तो तब भी हो जाती, अगर सारी औरतें ही औरतें होतीं। तब कौन दहेज-हत्या का पुण्य कमाता? कॉलेज, दफ्तर, चौराहे, बस, ट्रेन में कौन उनका जीना हराम करता। रेप, किडनेपिंग जैसे यौन अपराधों को कौन अंजाम देता? बेचारे मजनुओं की तो पूरी नस्ल ही मिट जाती। कॉस्मेटिक मार्केट का दीवाला पिट जाता। सौतिया डाह का तो पूरा इतिहास धूमिल हो जाता।
भला हो हम विषमलैंगिकों का वरना समलैंगिकों के भरोसे तो ये दुनिया कब की उजड़ गई होती। मानव प्रजाति डायनासोर की तरह विलुप्त हो जाती। क्योंकि तब इंसानी पैदावार का सिलसिला ही खटाई में पड़ जाता। सारे अनाथालय सूने हो जाते। बूढ़े मां-बाप को ओल्ड ऐज होम का रास्ता कौन दिखाता। भ्रूण-हत्या और गर्भपात से उपजा परम सुख हमें कैसे हासिल होता। जय हो कुदरती संतुलन की।

 

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