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और बाकी शहर

हमारे यहां शहर तेजी से बड़े हो रहे हैं, लेकिन इन शहरों में जिन बुनियादी सुविधाओं की कमी है, उनमें सार्वजनिक परिवहन भी एक है। देश का शायद ऐसा कोई शहर नहीं है, जिसके बाशिंदे सार्वजनिक परिवहन से संतुष्ट हों। लखनऊ, बनारस, पटना, भोपाल जैसे शहर अब इतने छोटे नहीं रहे कि रिक्शा या साइकिल से नापे जा सकें, लेकिन किसी शहर में कोई व्यवस्थित सार्वजनिक परिवहन नहीं है। इस क्षेत्र में हमारी लापरवाही का यह नमूना है कि आज तक हमारी कोई सार्वजनिक परिवहन नीति नहीं है, जबकि परिवहन का महत्व शहर और देश के संदर्भ में वही है, जो शरीर में खून की नलियों का होता है। हम यह कह सकते हैं कि हमारे देश की खून की नलियों में हर जगह ब्लॉकेज है। दिल्ली चूंकि राजधानी है और अगले साल यहां राष्ट्रमंडल खेल भी होने हैं, इसलिए यहां हजारों करोड़ रुपया खर्च करके मेट्रो बन रही है और आस-पास के शहरों से हाईस्पीड एसी ट्रेनें चलाने की भी योजना है। हालांकि शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने बीस लाख से ज्यादा आबादी वाले सभी शहरों के लिए मेट्रो की घोषणा की है लेकिन यह योजना कितनी व्यावहारिक है? अभी तो मुंबई और बंगलुरु जैसे शहरों में बात सिर्फ कागजों तक आई है तो उनसे छोटे शहरों की सुध कब ली जाएगी पता नहीं।

वैसे भी हर शहर के लिए न मेट्रो जरूरी है न व्यावहारिक। उससे बहुत कम खर्च में सड़कों पर बढ़िया सार्वजनिक परिवहन का इंतजाम किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए इच्छाशक्ति, नियोजन ओर सबसे ज्यादा परिवहन माफिया और नेता, बाबू गठजोड़ को तोड़ने का साहस चाहिए। लेकिन ये बातें तो दिल्ली में भी नहीं हैं, जबकि यहां पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। मेट्रो अपने आप में पूरा निदान नहीं है, उसके साथ बसों, टैक्सियों, ऑटो रिक्शाओं का एक सुव्यवस्थित तंत्र चाहिए, वह नदारद है इसलिए यह शहर मेट्रो का भी पूरा पूरा फायदा नहीं उठा सकता। जितना पैसा दिल्ली मेट्रो पर खर्च किया जा रहा है उससे कम से कम पैसों में मझोले शहरों में अच्छा परिवहन उपलब्ध कराया जा सकता है, बल्कि ऐसा होना चाहिए क्योंकि देश के साधनों पर सबका बराबरी का हक है। अच्छ सार्वजनिक परिवहन से लोगों का पैसा, समय और श्रम बचता है, प्रदूषण कम होता है और इस बचे हुए पैसे का रचनात्मक इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा विकास किसी ट्रैफिक जाम में न अटक जाए, तो इस पर ध्यान देना जरूरी है।

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