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पहचान का सम्मान

चुनाव आयोग ने स्त्री और पुरुषों से अलग नागरिकों की एक ‘अन्य’ श्रेणी की पहचान को स्वीकार कर उन हिजड़ों को सामाजिक सम्मान देने का बड़ा काम किया है जो इसके लिए वर्षों से तरस रहे थे। जाहिर है इक्कीसवीं सदी वैसी नहीं रहनी थी जैसी बीसवीं सदी थी, क्योंकि बीसवीं सदी भी उन्नीसवीं सदी जैसी नहीं रही थी। हमने साठ साल पहले जब अपने को गणतंत्र घोषित किया था तब यह सवाल हमारे सामने नहीं थे। अगर उठे होते हमारे संवेदनशील संविधान निर्माता उसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों के दायरे में शामिल करते। लेकिन आज अगर वह संवेदनशीलता बनी है तो यह उस संविधान का लचीलापन ही है, जिसके तहत पहले समलैंगिकता को दंडनीय अपराध मानने का प्रावधान रद्द किया गया और बाद में हिजड़ों को सम्मान दिया गया। मतदाता परिचय-पत्र में हिजड़ों को एक अलग श्रेणी देने की घोषणा देश के साठ लाख हिजड़ों के लिए एक सामाजिक क्रांति से छोटी घटना नहीं है। हिजड़ों के प्रतिनिधियों ने इसे वास्तविक लोकतंत्र का लक्षण बताते हुए इसका स्वागत भी किया है और उन्हें अपने लंबे संघर्ष में विजय मिलने की खुशी भी हुई है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील होने में है। हिजड़ों पर पीड़ा और अपमान का बोझ बहुत भारी है। इस बोझ को कम करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है। हिजड़ों के अधिकारों के प्रति चेतना जगाने में एचआईवी एड्स के लिए काम करने वाले नागरिक संगठनों का बड़ा योगदान है। वे उस सामाजिक कलंक को मिटाने का लंबा अभियान चला रहे हैं। इस दौरान कुछ ऐसे पारंपरिक परिवार भी सामने आए हैं, जिन्होंने हिजड़ा होने के बावजूद अपनी संतान को प्रेम और सम्मान पूर्वक घर में ही जगह दे रखी है। यानी परिवार और समाज अगर संवेदनशील होगा तो हिजड़ों को घर और समाज से बहिष्कृत नहीं होगा पड़ेगा। लेकिन हिजड़ों को मिलने वाली ‘अन्य’ की इस श्रेणी के साथ कुछ दिक्कत भी है। कुछ हिजड़ों ने यह भी सवाल उठाया था कि कई प्रदेशों की पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को मिले आरक्षण से वे वंचित हो जाएंगे। इसके अलावा सवाल उनकी जाति का भी उठेगा। लेकिन पहचान का सम्मान बढ़ेगा तो लोकतंत्र के अन्य सवाल भी हल कर लिए जाएंगे।

 

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  • Web Title:पहचान का सम्मान