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कुनबों में बंट गए टिकट, समर्पित कार्यकर्ता दरकिनार

बिहार में हाल के उपचुनाव में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेताओं के रिश्तेदारों को पार्टी का टिकट न देकर राजनीति में वंशवाद की परंपरा को ध्वस्त करने का एक ईमानदार प्रयास किया था। लेकिन, झारखंड विधानसभा चुनाव में वंशवाद और परिवारवाद का बोल-बाला दिख रहा है।

यहां विभिन्न नेताओं के सगे-संबंधियों को टिकट मिल गया और समर्पित कार्यकर्ता हाशिए पर रह गए। वर्षों से पार्टी का झंडा-बैनर ढोने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं ने अपने रिश्तेदारों को टिकट देना ज्यादा बेहतर समझा। वंशवाद के इस खेल में कोई भी पार्टी पीछे नहीं है।

भाजपा ने डालटनगंज से दिलीप सिंह नामधारी को टिकट दिया है। वह निर्दलीय सांसद इंदर सिंह नामधारी के पुत्र हैं। दिलीप हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं, जबकि उनके पिता पार्टी के एसोसिएट मेंबर बने हैं। इसी तरह झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन ने अपने पुत्र और बहू को टिकट देकर पार्टी में नई परंपरा की नींव डाली है। उन्होंने अपने पुत्र हेमंत सोरेन को दुमका से और अपने बड़े पुत्र दिवंगत दुर्गा सोरेन की विधवा सीता सोरेन को जामा से टिकट दिया है। इससे पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता नाराज बताए जाते हैं।

कांग्रेस ने खूंटी से रोशन कुमार सुरीन को टिकट दिया है। वह कांग्रेस की दिवंगत नेता सुशीला केरकेट्टा के पुत्र हैं। रोशन पिछली बार भी चुनाव लड़े थे। संथाल परगना में मधुपुर से वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और पूर्व मंत्री कृष्णानन्द झा के पोते अभिषेक झा को भाजपा का टिकट दिया गया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व पूर्व मंत्री कार्तिक उरांव की पुत्री और पूर्व विधायक बंदी उरांव की पुत्रवधू गीता उरांव को सिसई से कांग्रेस का टिकट दिया गया है।

मधु कोड़ा ने जगन्नाथपुर से अपनी पत्नी गीता कोड़ा को प्रत्याशी बनाया है। बताते चलें कि विधानसभा के पिछले चुनाव में बागुन सुंब्रई के पुत्र हिटलर, ददई दुबे के पुत्र अजय कुमार दुबे, सुशीला करकेट्टा के पुत्र रोशन कुमार और फुरकान अंसारी के पुत्र इरफान अंसारी को कांग्रेस का टिकट मिला था। मतदाताओं ने इन सभी को शिकस्त देकर वंशवाद  की  परंपरा को नकार दिया था।

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