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हिन्दी के अपमान की‘राज’ नीति

महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दी में शपथ लिए जाने पर सदन में हाथापाई को लेकर देश भर में विरोध का तूफान उठा है। इस उत्पात के विरोध की लहरें महाराष्ट्र में ‘फयान’ के तूफान की आशंका से कहीं ज्यादा ऊंची हैं। कई जगह भारी विरोध प्रदर्शनों के अलावा मनसे के चार विधायकों के निलंबन के बाद मराठियों के नाम पर क्षेत्रीय राजनीति करने वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को सदन से माफी मांगनी पड़ी है। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके दूरगामी परिणाम राज्य की राजनीति और वहां के विकास पर निकट भविष्य में पड़ सकते हैं। क्योंकि राज्य के विकास और उसे अंतर्राष्ट्रीय फलक पर चमकाने में उत्तर भारतीयों का बड़ा हाथ रहा है। इस सप्ताह मनसे के इसी कथित हिन्दी विरोधी आंदोलन से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल कर रहे हैं विशेष संवाददाता नवीन कुमार


महाराष्ट्र प्रांतवाद और भाषावाद की आग में झुलस रहा है, ऐसा मानना अतिश्योक्ति नहीं है क्योंकि राज ठाकरे के नेतृत्व वाली चरमपंथी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने अपने विखंडनवादी आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से इनकार कर दिया है। मनसे ने महाराष्ट्र विधानसभा में सपा विधायक अबू आसिम आजमी के हिन्दी में शपथ लेने की वजह से हंगामा खड़ा किया जबकि हिन्दी में शपथ लेना संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत आता है। अब राष्ट्रभाषा हिन्दी के संवैधानिक अस्तित्व पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। संविधान के रचयिता डाक्टर बाबासाहेब अंबेडकर महाराष्ट्र से थे तो लोकमान्य बाल गंगाधार तिलक ने इसी महाराष्ट्र में हिन्दी में अखबार शुरू किया था। ताजा उदाहरण यह है कि मराठी के नाम पर 40 साल से राजनीति करने वाली शिवसेना का हिन्दी अखबार दोपहर का ‘सामना’ मुंबई से निकल रहा है। फिर हिन्दी के नाम पर राजनीति क्यों की जा रही है।
विवाद की पृष्ठभूमि
हिन्दी और मराठी के बीच खाई पैदा करने की इस कोशिश के पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा है या सच में आम मराठीभाषी के अंदर कोई पीड़ा है जिससे वह मनसे या शिवसेना के साथ हो रहे हैं। इस पर राजनीतिक नजरिए से चर्चा करने से पहले हमें यह जानना होगा कि महाराष्ट्र के आर्थिक-सामाजिक विकास में हिन्दी की किस तरह की भूमिका है। लोकसत्ता के सम्पादक कुमार केतकर मानते हैं कि हिन्दी का बहुत बड़ा योगदान है।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ की बोली तो हिन्दी ही है। वहां मराठी कम सुनने को मिलती है। मुंबई की हिन्दी अलग है। मगर यह सच है कि मुंबई में उत्तर भारतीय ज्यादा आ गए हैं और मराठी को यहां से भागना पड़ रहा है। इससे संतुलन बिगड़ गया है। दूसरी बात यह है कि गुजराती और मारवाड़ी जिस तरह से अर्थजगत में आगे हैं, उस तरह से उत्तर भारतीय नहीं हैं। उत्तर भारतीय ट्रेड और लेबर में ज्यादा हैं। उन्होंने आर्थिक विकास के लिए इंडस्ट्री नहीं लगाई है। यही हालत मराठियों की भी है। इसलिए उत्तर भारतीयों और मराठी के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। वैसे, ट्रेड और लेबर से भी बुनियादी इकोनॉमी को बढ़ावा मिलता है। जहां तक हिन्दी और उत्तरभारतीयों के विरोध का मामला है तो यह सिर्फ तमाशा है। लोगों की भावनाओं को भड़काया जा रहा है।
बौद्धिक वर्ग का रुझान
केतकर की बात में काफी दम है। ट्रेड और लेबर क्लास में मराठी हैं जिससे राजनीतिकों को उनकी भावना के साथ खेलना आसान हो गया है। इस तरह की राजनीति करने वालों पर बुद्धिजीवी वर्ग सीधे-सीधे हमला नहीं कर सकता। उनको पता है कि उलट हमला होने से उनका नुकसान होगा। यही वजह है कि शिवसेना या मनसे के तरीकों के खिलाफ खुलकर बोलने वाले कम हैं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की आलोचनाएं सुनते थे और वह उन पर पलटवार करने से बचते थे। वह कहते थे कि उनकी आलोचना करने वाले ज्ञानी लोग हैं। मगर शिवसेना का शिकार जब विजय तेंदुलकर जैसे मुखर व्यक्तित्व वाले साहित्यकार हुए तो यह माना जाने लगा कि शिवसेना अपनी सीमा से बाहर आ गई है। शिवसेना से भी ज्यादा उग्र मनसे है जिस कारण बुद्धिजीवी राज का समर्थन भले ही न करते हों पर उनकी आलोचना से भी बचते हैं।
मराठी की वकालत करने वाले राज अंग्रेजीपरस्त हैं। वह अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा अंग्रेजी में करा रहे हैं। मगर दूसरों पर यह दबाव डाल रहे हैं मराठी अपनाओ। मराठी साहित्यकार चंद्रकांत बांदिवडेकर मानते हैं कि यह मराठी प्रेम नहीं है। उन्हें हिन्दी को राजभाषा न कहने पर भी आश्चर्य होता है जबकि अंग्रेजी के माहौल में आज भी भारत के बहुसंख्य लोग हिन्दी को स्वीकार करते हैं। चंद्रकांत बांदिवडेकर जैसे व्यक्ति की सोच से जाहिर होता है कि हिन्दी की पैठ कितनी गहरी है।
महाराष्ट्र में जिस तरह से भाषा को लेकर आम लोगों में विरोध नहीं है, उसी तरह से हिन्दीभाषियों को लेकर भी नहीं है। चाहे हिन्दीभाषी लेबर के रूप हो या उससे ऊपर उठकर काम करके महाराष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे रहे हों। हिन्दीभाषी अंबरीश मिश्र अंग्रेजी के अलावा मराठी में भी लिखते हैं। डोम्बिवली में वाजपेयी मराठी स्कूल में प्रिसिपल थे। वह मराठियों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। उन्होंने सैकड़ों गैरमराठियों को मराठी सीखने के लिए प्रेरित किया। अगर इतिहास में झांकें तो शिवाजी के इतिहास को जन-जन तक ले जाने में कवि भूषण का बड़ा योगदान रहा है।
परिणाम और उनके असर
मराठी साहित्यकार सुलभा कोरे कहती हैं कि मुंबई में हिन्दी अच्छी बोली जाती है। हिन्दी और मराठी में काफी समानता है। इसलिए ज्यादातर मराठीभाषी मराठी के बजाए हिन्दी बोलते हैं। वह मानती हैं कि हिन्दी ने महाराष्ट्र के आर्थिक संसार को बदला है। भाषा के साथ हिन्दी भाषियों ने भी अपनी लगन और मेहनत से आर्थिक ढांचे में बदलाव करने में योगदान दिया है। मगर कुछ विशिष्ट लोगों के कारण हिन्दी और मराठी के बीच दरार पैदा हो रही है। महाराष्ट्र और मुंबई में रहकर मराठी के प्रति सौतेली भावना रखने से भी दुराव पैदा होता है। अगर लंबे समय से यहां रहने वाले लोग मराठी भाषा और संस्कृति को अपनाने से दूर रहते हैं तो उनकी भावना पर शक किया जाता है। अगर सपा विधायक अबू आजमी के कथित हिन्दी प्रेम पर मनसे ने हंगामा किया तो उसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। कोरे के हिसाब से यह विरोध क्षेत्रीयतावादी मानसिकता रखने वाले लोगों की उपज है। कोरे यह भी मानती हैं कि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। उनकी इस बात में दम है कि जब मराठी हिन्दी बोलते हैं तो गैरमराठी मराठी बोलने में क्यों परहेज करते हैं ? मगर मनसे के नेता राज को यह संवैधानिक अधिकार नहीं है कि वह या उनकी पार्टी के लोग सरकार को नजरअंदाज करके हिंसा के रास्ते से कुछ भी मनवा लें। राज की राजनीति इसी बुनियाद पर चल रही है। उन्हें संविधान से कोई लेना-देना नहीं है। वह सिर्फ मराठी के कथित हितैषी बनकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं। इस तरह की राजनीति की ज्यादा उम्र नहीं होती है। शिवसेना इसका उदाहरण रही है। मगर राज की मनसे की तुलना शिवसेना से नहीं की जा सकती क्योंकि अब मराठीभाषी के अंदर जो कुंठा व्याप्त है, जो पीड़ा है, वह राज के 13 विधायकों के चुने जाने से दिखाई दे रही है। यह कहा जा सकता है कि मराठी के नाम पर मनसे और शिवसेना के बीच अस्तित्व की लड़ाई चल रही है और इसमें मराठी वोट बंट रहे हैं।
राज अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से आगे निकलते दिख रहे हैं। शिवसेना से नाराज मराठे राज को दूसरा बाल ठाकरे बनाने में मदद कर रहे हैं। मगर दो भाइयों की इस लड़ाई में जिस तरह से हिन्दी और हिन्दीभाषियों को निशाना बनाया जा रहा है, उससे महाराष्ट्र और खासकर मुंबई के आर्थिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

मराठा राजनीति 40 वर्षो में भी नहीं बदल पाई मराठियों की तकदीर
अक्सर लोग ताजमहल और कुतुबमीनार को याद रखते हैं। मगर उसे यादगार बनाने के लिए मेहनत करने वाले मजदूरों को लोग भूल जाते हैं। वही स्थिति हिन्दीभाषी मजदूरों की है। महाराष्ट्र की बुनियादी इकोनॉमी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले यूपी-बिहार के मजदूरों की मेहनत को इस तरह से देखा जा रहा है कि ये तो सिर्फ कमाई कर रहे हैं। सच तो ये है कि महाराष्ट्र में भवन निर्माण हो या कोई अन्य व्यवसाय, उसे तब तक बढ़ावा नहीं मिलेगा जब तक मजदूर काम नहीं करेंगे। यह दीगर बात है कि भूमिपुत्रों को भी काम चाहिए। इसमें व्यवसायी अपना फायदा देखते हैं। सस्ते में बाहरी मजदूरों को काम देकर भूमिपुत्रों के लिए परेशानी खड़ी करते हैं। ऐसे में मनसे हो या शिवसेना, उसे मजदूरों के विरोध के बदले मालिकों की सोच को बदलने का काम करना चाहिए। मगर ऐसा करने से उनकी राजनीति प्रभावित होती है। यही वजह है कि शिवसेना 40 वर्षो में मराठियों की तकदीर बदलने में नाकाम रही है। शिवसेना के पेट से निकली मनसे भी उसी राह पर है। बस, मनसे शिवसेना से ज्यादा हंगामा खड़ा करने में विश्वास करती है। इसी हंगामे के साथ राजनीति करने वाली मनसे का दोहरा चरित्र विधानसभा चुनाव में सामने आया था। उत्तर भारतीयों की पिटाई करने और मराठी का राग अलापने वाली मनसे ने वोट बटोरने के लिए हिन्दी में प्रचार सामग्री छपाकर मदद ली है। अब उसी हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने से इनकार कर रही है।
मनसे और शिवसेना की उत्तर भारतीय और हिन्दी विरोधी राजनीति के केंद्र में मुंबई ही है। मनसे या शिवसेना हो या बाहरी लोग, सब के सब मुंबई को ही महाराष्ट्र मान रहे हैं। इसलिए मनसे और शिवसेना दोनों बार-बार मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश का मुद्दा उठाते हैं। ये दोनों पार्टियां मान रही हैं कि उत्तर भारतीय मुंबई में बस रहे हैं और यहां राजनीति कर रहे हैं जिस कारण इसे अलग राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। इस तरह की बातों से मराठियों की भावनाओं को भड़काया जाता है और राजनीति की जा रही है। मगर मुंबई का विकास अपनी रफ्तार से चल रहा है और यहां रोजगार के ज्यादा अवसर मिलते हैं जिससे बाहरी लोगों के आने का सिलसिला थम नहीं रहा है।

‘कमाई’ हिन्दी की ‘माया’ मुंबई की

मुंबई में हिन्दी और हिन्दीभाषी का सबसे बड़ा योगदान स्वयं बॉलीवुड में ही देखने को मिलता है। बॉलीवुड उसी मुंबई में है जहां सबसे ज्यादा उत्तर भारतीयों के रहने का आरोप लगाया जा रहा है। बॉलीवुड अब 15 हजार करोड़ से ज्यादा का बिजेनस करता है। इसी से लगभग दो लाख लोगों का पेट पलता है। इनमें मराठी और गैरमराठी दोनों हैं। भारतीय फिल्म उद्योग के जनक माने जाते हैं दादासाहेब फालके मराठी थे और इस उद्योग को चलाने के लिए गुजराती और पारसी लोगों ने आर्थिक योगदान दिया था। स्टूडियो परम्परा को आगे बढ़ाते हुए वी. शांताराम जैसे फिल्मकार ने कलाकारों और तकनीशियनों को आयात किया।
बाद में दिलीप कुमार, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चान जैसे सुपरस्टार पैदा हुए जिनका संबंध उत्तर भारत से था। इनके बल पर फिल्म उद्योग का व्यवसाय आसमान छूता रहा है। अगर राज ठाकरे अमिताभ बच्चान के फैन हैं तो बिग बी के खिलाफ आंदोलन करने में भी वे आगे रहे हैं। उनका आरोप है कि बिग बी अपनी कमाई का हिस्सा यूपी के विकास पर खर्च करते हैं और हिन्दी के अलावा सिर्फ भोजपुरी फिल्मों में काम करते हैं। जबकि बिग बी ने मराठी फिल्मों में भी काम किया है।
‘श्वास’ एवं ‘हरिश्चंद्रची फैक्टरी’ जैसी मराठी फिल्मों को आर्थिक सहयोग दिया है जिससे ये फिल्में ऑस्कर में भेजी गईं। लता मंगेशकर अपनी आवाज के बल पर सिर्फ महाराष्ट्र या मराठी भाषा की गायिका नहीं है बल्कि वह भारत की स्वर कोकिला कही जाती हैं। माधुरी दाक्षित करोड़ों दिलों की धड़कन रहीं तो हिन्दी फिल्मों के सहारे। आज रितेश देशमुख को हिन्दी फिल्मों से पहचान मिली है। बॉलीवुड को हिन्दी का सबसे बड़ा प्रचारक माना जाता है और इसी बॉलीवुड की वजह से मुंबई का नाम पूरी दुनिया में है और पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है। अगर बॉलीवुड को दूसरे प्रदेश में शिफ्ट कर दिया जाए तो मुंबई के सिर से देश की आर्थिक राजधानी का ताज छिन जाएगा। मराठी निर्देशक आशुतोष गोवारिकर ‘लगान’ जैसी हिन्दी फिल्म के लिए किसी भाषावाद या प्रांतवाद में नहीं फंसते हैं। 

महाराष्ट्र विधानसभा में हिन्दी पर हंगामा करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि एक मराठी भाषी डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ही इस देश के संविधान की रचना के समय पूरे देश को बताया था कि इस देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही हो सकती है। यह सोच देश के संविधान में दर्ज है। देश के सबसे बड़े हिन्दी पत्रकार बाबूराव विष्णु पराड़कर और हिन्दी के सबसे बड़े कवि मुक्तिबोध भी मराठी भाषी ही थे जिन्होंने हिन्दी की बड़ी सेवा की। 
राजेंन्द्र यादव, ‘हंस’ के संपादक और वरिष्ठ साहित्यकार

महाराष्ट्र की आर्थिक प्रगति पूरी तरह हिन्दी पर आश्रित है। यदि महाराष्ट्र से केवल हिन्दी उद्योग ही हटा लिया जाए तो वहां की पूरी आर्थिक रीढ़ ही टूट जाएगी।
रवीन्द्र कालिया, साहित्यकार

 

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