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मानवता: प्रचलित सरोकारों से हट कर

दिल्ली की ट्रैफिक पुलिस चाहती है कि राजधानी की कुछ सड़कों पर साइकिल रिक्शों पर लगा प्रतिबंध न हटे। उसका कहना है कि व्यस्ततम सड़कों पर रिक्शे के कारण यातायात को नियंत्रित करना और मुश्किल होता है। 2006 में चांदनी चौक तथा मुख्य मार्गों पर रिक्शा प्रतिबंधित किया था। इस प्रतिबंध के खिलाफ ‘मानुषी’ नामक संस्था ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। ट्रैफिक पुलिस की दलील है कि जहां 2001 में दिल्ली में वाहनों की संख्या 37 लाख थीं, वहीं 2007 में 60 लाख हो गयी है।

उनकी दूसरी दलील यह है कि रिक्शेवालों का लाइसेंस न होने के कारण गलती करने पर भी उनका चालान नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ, केस करने वाली संस्था हर हालत में रिक्शेवालों को सड़क पर उतारने के पक्ष में है। उसने रिक्शों की अनुमानित संख्या छह लाख बतायी है, जबकी रिक्शा नीति में इनकी संख्या 99 हजार तक रखी गयी है। इस मुद्दे के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर गौर करें तो पहली बात यह है कि हमारे शहरों की संरचना ऐसी बनायी गयी है कि उसमें बड़ी आबादी की जरूरतों को प्राथमिकता देने की मंशा नहीं दिखती। सड़कों के निर्माण में देखें तो पैदल यात्रियों के फुटपाथ, साइकिल ट्रैक आदि की कमी है। दूसरी बात खस्ताहाल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का,जिसे दुरुस्त करने के आधे-अधूरे कदम उठाये जाते हैं। तीसरी बात, पर्यावरण का मसला उठाया जाता है, जिसमें निजी गाड़ियों के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है। यह भी दलील लगातार आई है कि साइकिल रिक्शा की सवारी पर्यावरण के अनुकूल है। चौथी, रोजगार का मुद्दा उठाया जाता है कि साइकिल रिक्शा लाखों को रोजगार भी देता है।

ये सारे मुद्दे और सरोकार सही हैं, लेकिन एक मुद्दा भविष्य के समाज में अधिक उन्नत नागरिकता बोध (सिविक सेन्स) का तथा मानवीय गरिमा का भी है, वह इस पूरी चर्चा में गायब है। क्या भविष्य का समाज हम ऐसा बनाना चाहते हैं, जिसमें एक मनुष्य दूसरे को खींच कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये? अगर कोई बीमार या असहाय है तो उसे कन्धों पर उठा कर ले जाना चाहिए। दरअसल साइकिल चलाना और साइकिल रिक्शा चलाना एक ही बात नहीं है। किसी की मदद के उद्देश्य से तो साइकिल के कैरियर पर भी दूसरा इंसान बैठ जाता है, लेकिन उससे ऊंच-नीच या गैर बराबरीपूर्ण संबंध नहीं बनते हैं।

रोजगार के लिए बेहतर विकल्पों की मांग बननी चाहिए। यदि सिर्फ कमाने का अवसर मिलना पर्याप्त है तो आठ लाख लोग जो मैला ढोने के काम में लगे हैं, उन्हें भी वह ‘रोजगार’ मिलते रहना चाहिए। पर कोई सभ्य इंसान इस पर हामी नहीं भर सकता, क्योंकि हमारी सभ्यता जहां पहुंची है, उसमें वह गरिमा के खिलाफ है। समाज जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा उसे मैन्युअल श्रम का धीरे-धीरे विकल्प तलाशना होगा।
यातायात के साधनों में ऐसे विकल्प भी तलाशने होंगे, जो पर्यावरण को भी कम नुकसान पहुंचाए और आज के भागदौड़ की जिन्दगी की जरूरत भी पूरी करे। यद्यपि ट्रेनें एक हद तक पर्यावरण को क्षति पहुंचाती है, लेकिन क्या ट्रेनों को बन्द कर बैलगाड़ी को चलाने की बात सोची जा सकती है?

सोचना तो यह होगा कि रेलगाड़ी की उन्नत तकनीक कैसे बने, जिसमें कम से कम नुकसान हो। मजबूरी में तो लोग अपनी किडनी और दूसरे अंग तक भी बेचते हैं, लेकिन क्या इसे गरीबी या मजबूरी से निपटने का रास्ता मानें? ट्रैफिक पुलिस की दलील एक तरफ जहां सिर्फ अपनी ट्रैफिक नियंत्रण की समस्या से उपजी है, तो नगर निगम जनता के बीच बुरा नहीं बनना चाहती। उसे चुनाव के समय आलोचना की चिंता है। वहीं जो संस्था कानूनी लड़ाई लड़ रही है, यह साबित करना चाहती हैं कि वह कैसे जनसरोकारों से लैस है। लेकिन समग्रता में समस्या को सम्बोधित करने के लिये संघर्ष कई स्तरों पर बनेंगे। रिक्शा उसी तबके के लोग खीचेंगे, जिन्हें भरपूर पौष्टिक आहार भी नहीं मिलता है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तथ्य का भी अन्दाजा लगाने का प्रयास किया है कि इन रिक्शेवालों की जीने की औसत उम्र क्या होती है। वे अधिकतर किस प्रकार की बीमारी के शिकार होते हैं आदि। मान लें दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे परिसर में जहां हमें गरिमामय मूल्य भी युवाओं में डालने चाहिए, वहां एक युवा छात्र या छात्र एक बुजुर्ग या नाबालिग द्वारा चलाये जा रहे रिक्शे पर सवार होकर अपने पैसे के दम पर ऐसी सुविधा खरीद कर क्या सीखेगा?

लेखिका स्त्री अधिकार संगठन से सम्बद्ध हैं

 

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