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विद्यापति

‘‘तातल सैकत वारि-विंदू सम सुत वित रमनि समाजे
तोहे विसारि मन ताहे समरपिलु अब मझु होवे कोन काजे’’
‘‘जिस प्रकार गर्म रेत पर पानी की एक बूंद का अस्तित्व होता है, वैसे ही पुत्र, धन और प्रेयसी का संबंध व्यक्ति के जीवन में है। माधव (ईश्वर) तुम्हें विसरा कर (भुला कर) हमने अपना जीवन उन्हें समर्पण कर दिया। अब हमारा क्या होगा।’’ मैथिली कवि विद्यापति के काव्य, जीवन दृष्टि और काव्यधारा का इन चार पंक्तियों के आधार पर ही आकलन किया जा सकता है। उनके काव्य में भक्ति और श्रृंगार रस का योग दिखता है। इनके पदों को जीव और परमात्मा के संबंध का रूपक भी माना जाता है।
‘‘सखि, कि पूछसि अनुभव मोय
से हो पिरति अनुराग बखानिए,
तिल-तिल नूतन होय।
जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल
से हो मधु बोल स्त्रवाहिं सूनल स्त्रुति पथ परस न भेल।’’ सखि, मुझसे अनुभव क्या पूछती हो। मेरी प्रीत तो हर पल नूतन होती है। संपूर्ण जीवन हम उनका रूप निहारती रहीं। नयन तृप्त नहीं हुआ। उनका मधुर बोल श्रवण अंग के बाहर ही रह गया। कर्णरंध्र के पथ ने स्पर्श ही नहीं किया। सौंदर्य के वर्णन में विद्यापति विश्व में अनूठे हैं। वे लोक कवि नहीं थे। परंतु उनकी पदावलियां लोक गीतों की तरह गाई जाती हैं। शिव और कृष्ण दोनों को उन्होंने अपना काव्य साध्य बनाया। ‘‘गे माई व्रत-जप-तप मोरा की भेल
            कौने कथिला कयोलो नित दान
            पारवती के इ वर होयत अब न रहल मोरो प्राण।’’
शिव के दुल्हा रूप का विस्तृत वर्णन कर विद्यापति की मैना कहती हैं कि मेरे व्रत-जप-तप का क्या फल मिला? यदि पार्वती को यह वर मिलेगा तो मेरा प्राण नहीं रहेगा। विद्यापति हिंदी के आदि गीतकार माने जाते है। ये मैथिल कोकिल के नाम से भी प्रसिद्घ हैं। मधुर गीतों के रचयिता विद्यापति ‘अभिनव जयदेव’ के नाम से भी जाने जाते हैं। पर सच है कि विद्यापति, विद्यापति हैं -
‘विद्यापति कवि गायल रे, गाई-गाई समझावल’
कवि ने कवि और गीतकार धर्म का पालन करते हुए बार-बार जग को समझाने की कोशिश की है।

 

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  • Web Title:विद्यापति