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अर्थव्यवस्था में रोशनी

सितम्बर में नौ फीसदी से ज्यादा बढ़त दर्ज कराने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक उसी आशावाद को पुख्ता कर रहा है, जिसने इधर भारत और चीन के कंधों पर ग्लोबल मंदी के अंधेरों में उम्मीद के दिये जलाए रखने की जिम्मेदारी डाल दी है। बुधवार को खबर आई थी कि चीन में अक्टूबर के दौरान कारखानों का उत्पादन 16 फीसदी की शानदार रफ्तार से बढ़ा और गुरुवार को भारत के कारखानों से यह खुशखबरी आ गई। इसे अगर अक्टूबर के दौरान भारतीय कार बाजार की बिक्री में दर्ज 34 प्रतिशत की बढ़त से जोड़कर देखा जाए तो यह साफ होते देर नहीं लगती कि ग्लोबल मंदी का जो थोड़ा-बहुत अप्रत्यक्ष असर भारतीय अर्थतंत्र पर था, वह भी अब विदा हो रहा है। कारखाने किसी भी अर्थतंत्र की जान होते हैं। वही रोजगार की दशा-दिशा तय करते हैं और वही आम खरीदारों और निवेशकों की कारोबारी आस्था के सबसे सच्चे संकेतक भी होते हैं। दैनिक नफे-नुकसान के अल्पकालिक नजरिए को प्राथमिकता देने वाले शेयर बाजार भले ही औद्योगिक उत्पादन के गुरुवार के आंकड़ों पर उतना जोश न दिखा रहे हों, लेकिन ये आंकड़े इकॉनमी की आधारभूत दीर्घकालिक मजबूतियों को ही रेखांकित कर रहे हैं। त्योहारी और शादी-ब्याह के सीजन के साथ-साथ यह छठे वेतन आयोग से झरी समृद्धि का साझा असर है कि बाजार मांग में इधर लगातार इजाफा हो रहा है और माना जाने लगा है कि अक्टूबर की औद्योगिक उत्पादन दर चीन के आंकड़े की तरह 15-16 प्रतिशत रहेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले माह हिन्दुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में जब यह कहा था कि भारत कमजोर कृषि उत्पादन के बावजूद अगले दो-तीन बरस में वापस 10 फीसदी विकास दर बहाल कर लेगा तो बहुत से लोगों को अचरज हुआ था। लेकिन ये ताजा आंकड़े उस आशावाद का आधार स्पष्ट कर रहे हैं। विदेशी बाजारों से भले ही छंटनी की छिटपुट खबरें आ रही हों, लेकिन भारतीय कारपोरेट सेक्टर आज लाखों नई नौकरियों के सृजन की बात कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से सोना खरीदने का भारत का हाल का फैसला आर्थिक मजबूती का ऐसा ही दूसरा संकेत है। कुल मिलाकर यह भारतीय रिजर्व बैंक की सतर्क वित्तीय अप्रोच और अर्थतंत्र की बुनियादी मजबूतियों की साझा जीत है। इसे शाबासी की दरकार है।

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