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मुख्यमंत्री की थाली में अब मछली भी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की थाली में मछली भी चुपके से घुस गई है। यह अलग बात है कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद की तरह उन्हें भोला बाबा ने मछली खाने या न खाने के बारे में कोई आदेश नहीं दिया। मछली खाने का फैसला उनका अपना है। संभव है डॉक्टरों की सलाह पर उन्होंने मछली खाना शुरू किया हो।

बहरहाल, कभी-कभार एक अणे मार्ग में मछली पकती है। ऐसे मौके पर मुख्यमंत्री खास लोगों को दावत पर बुलाते भी हैं। ऐसी बात नहीं है कि नीतीश कुमार शुरू से शाकाहारी हैं। 10 साल पहले तक वे चाव से छोटी मछली खाते थे, लेकिन एक दिन मछली के कांटे से इस कदर परेशान हुए कि उन्होंने मछली से कुट्टी कर ली। वर्षों तक वे सिर्फ शाकाहारी भोजन ले रहे हैं। हां, भोजन में चावल और चोखा जरूरी है।

शाम में पकौड़ी मिल जाए तो बात ही कुछ अलग होती है। शाम की बैठकी में शामिल लोगों के सामने भी तरह-तरह की पकौड़ियां परोसी जाती हैं। दोबारा मछली खाने की इच्छा हुई, तो मुश्किल भी आई। मुश्किल यह कि मछली बनाएगा कौन? किसी ने बताया कि सरकारी गाड़ी का ड्राइवर बढ़िया मछली बनाता है। उसकी पेशी हुई और जब मछली बनी तो सबने तारीफ की। मेजमान, मेहमान और ड्राइवर -तीनों खुश। आखिर ड्राइवर को मुख्यमंत्री की रसोई में घुसने का मौका जो मिला।

हालांकि शाकाहार व्रत मछली पर ही समाप्त है। मांस और मुर्गे की पहुंच उनकी थाली तक नहीं हो पाई है। वैसे, मुख्यमंत्री आवास में आयोजित होनेवाली दावतों में मांस और मुर्गे का प्रबंध इफरात में रहता है। मुख्यमंत्री खुद मेजमानों से मांस-मुर्गा खाने का आग्रह करते हैं। यह भी पूछते हैं कि कैसा बना है। इस मामले में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी विशुद्ध शाकाहारी हैं। वे न खुद खाते हैं, न दावत में मांसाहार परोसते हैं। यह अलग बात है कि पशुपालन विभाग का मंत्री रहने के दौरान मोदी ने मछली और मुर्गे का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कारगर प्रयास किया।

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