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बिल बनाने व बनवाने वाले दोषी : सीएमएस

जिला अस्पताल के सीएमएस डॉक्टर रामजी लाल का कहना है कि फर्जी बिल बवनाने और बनाने में दोनों ही दोषी है। स्वास्थ्य विभाग में क्लेम बिल वैरीफाई के लिए आते है। जिन्हें दवाओं की रेट लिस्ट से मिलान कर वैरीफाई कर दिया जाता है।

फार्म ए और बी के साथ डैथ सर्टिफिकेट विभाग के पास नहीं आता। लिहाजा चेकिंग में यह पकड़ना मुश्किल है कि बिल फर्जी है अथवा असली। अब इस मामले में वह विभाग नोटिस जारी कर फर्जीवाडे का मामला दर्ज करा सकता है। जिस विभाग को क्लेम के लिए मेडिकल कागज दाखिल किये है। डॉक्टर मलय शर्मा का कहना है कि रोगी का इलाज हुआ था। उसकी खाने के नली में कैंसर की बीमारी से मौत हो गई थी। रोगी के उपचार के दौरान कराई गई जांच और दवाईयों का बिल तत्काल भुगतान नहीं किया गया था।

जिस तारीख में बिल भुगतान किया। इसी तारीख में भुगतान रसीद दी गई। मैने बिलों को वैरीफाई किया है। इसमें सिर्फ त्रुटि यह हुई कि पहले का डय़ू भुगतान का उल्लेख करते हुए बिल देने की तारीख का उल्लेख किया जाना था। हालांकि कुछ बिलों पर यह उल्लेख किया है। हो सकता है कुछ बिलों पर यह टिप्पणी अंकित करना रह गया। रोगों की परिजनों को दिये बिलों के पीछे कोई गलत मंशा नहीं थी।

सिर्फ लिपिकीय त्रुटि से यह भ्रम की स्थिति पैदा हुई। इन बिलों का रोगी के परिजन मिस यूज करे तो वह इसमें क्या कर सकते है। उन्होंने इस बारे में सीएमओ को भी स्पष्ट कर दिया है। ठीक इसी तरह सुशीला जसवंत राय अस्पताल प्रबंधन का भी कहना है कि बिलों में लिपिकीय त्रुटि का मामला है। ऐसा कतई नहीं है। जैसा इसका अर्थ निकाला जा रहा है।

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