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बारानाजा फसल ने बचाया किसानों को

धान की फसल चौपट होने से पैदा हुई अकाल जैसी स्थिति में परंपरागत बारानाजा फसल इस बार काश्तकारों के लिए वरदान साबित हुई है। मगर सरकारी विपणन प्रणाली के ग्राम स्तर पर न होने से बिचौलिए मेहनत से उगायी बारानाजा फसल को औन-पौने दामों में खरीद रहे हैं।

इससे परंपरागत खेती को लेकर काश्तकारों का जो उत्साह बना था वह ठंडा पड़ रहा है। मौसम की बेरुखी ने इस बार कई खेतों में धान की रोपाई नहीं होने दी और जहां थोड़ा बहुत हुई भी वहां बिना पानी के सूख गयी।
अकाल जैसे स्थिति  बनते देख काश्तकारों ने उखड़े खेतों में परंपरागत बारानाजा फसल बोनी शुरू कर दी। बिना पानी के सहारे उपजने वाली बारानाजा में

मंडुवा, चौलाई, तोर, सोयाबीन, गहथ, जखिया, भंगजीरु, तिल, मिंडलू, कौणी, झंगोरा उड़द आदि शामिल है। गहथ, चौलाई मर्सा, जाखिया, झंगोरा का इस बार तो रिकार्ड उत्पादन तक हो गया। मगर उचित सरकारी विपणन प्रणाली न होने से इसका लाभ काश्तकारों को घर बैठे बारानाला फसल का खास लाभ मिलता। धान की फसल से हुए नुकसान की भी इससे भरपाई हो जाती। सरकार किसान क द्वार व कृषि महोत्सव का ढिंढेारा करने के बजाय काश्तकारों को बिचौलिए से बचाया जाये।

 कई किमी चलकर अनाजों को पीठ में लादकर काश्तकार स्थानीय दुकानों तक लाता हे वहां जो दाम लगता है उस पर ही वह मेहनती से उगाये अनाज को बेचने को मजबूर होता है। गहथ इस बार भले ही 35 के बजाय 60 रुपये बिका हो मगर झंगोरे का उसे 8 रुपये ही मिला है। बिचौलिये झंगोरा 22 रुपये तक बेच रहे हैं। सरकार काश्तकारों के चेहरों की रौनक बनाने की गर सचमुच मंशा रखती है तो उसे विपणन प्रणाली की शुरुआत किसान के दरवाजे से ही शुरू करनी होगी।

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