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सद्गुण के साधक

जप, तप, परिश्रम, तपस्या, कठोरश्रम और साधना जिदंगी को सफल बनाने के लिए जरूरी माने गए हैं। जिनके अन्दर तप या साधना नही है, वह अपनी मंजिल तक सच्चाई से नहीं पहुंच सकता है। इसलिए हर उस इंसान के लिए कठोर परिश्रम करना जरूरी माना गया है, जो सच्चाई से अपनी मंजिल पाना चाहता है। ऐसे लोग सद्गुणों को अपनाने और दुगरुणों को छोड़ने में हमेशा तैयार रहते हैं। सद्गुणों के बारे में कहा गया है- ये जिदंगी को सुन्दर और बेहतर बनाने वाले ऐसे गहने हैं, जो खुद को ही बेहतर नहीं बनाते, बल्कि परिवार और समाज को भी इनसे बहुत फायदा पहुंचता है। सद्गुण को अपनाने के लिए या सद्गुण रूपी गहनों को धारण करने के लिए इतना जरूर गौर करना पड़ता है कि ‘सार-सार को गहि रहे थोथा देहि उड़ाय’ यानी कहीं से और किसी से भी बेहतर बनाने वाले सद्गुण मिले, बिना किसी झिझक के ले लेना चाहिए ।
पर खुद को और परिवार को बेहतर बनाने वाले इन सद्गुणें को अपनाने की कोशिश सभी लोग क्यों नहीं करते? क्या लोग अपना और समाज का भला नहीं चाहते हैं? दरअसल सभी अपना भला तो चाहते ही हैं। लेकिन समाज की भलाई में सब की दिलचस्पी नहीं होती है। जो परिवार, समाज और खुद का वाकई भला करना चाहते हैं, उन्हें ही साधना यानी तपस्या की जरूरत होती है। वे कौन से सद्गुण हैं, जिन्हें अपनाकर बेहतरी लाई जा सकती है?

वे सद्गुण हैं-धर्म, सत्य, दया, क्षमा, दान, उपकार, अहिंसा, न्याय, सहिष्णुता और करुणा। इन्हें धारण करने के लिए हमें जरूरत पड़ती है विवेक की। बिना विवेक के सद्गुणों औंर दुगरुणों में अन्तर नहीं किया जा सकता है। इसलिए ऐसे ही कर्म करने चऋहिए, जो विवेक यानी समझ को प्रभावित करने वाले न हों। सद्गुणों के साथ जिन्दगी बसर करने के लिए उन सभी बातों से परहेज करना चाहिए जो किसी भी स्तर पर साधना को प्रभावित करते हों। तभी हम अच्छे साधक बन सकते हैं।

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