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अमेरिकी विसंगति

दुनिया से आतंकवाद मिटाने और वहां आजादी के साथ अमन-चैन कायम करने का अमेरिकी दावा कई बार उसके घरेलू कानूनों के आगे घुटने टेकता नजर आता है। अमेरिकी नागरिकों और उसके राज्य को मिले इसी विशेषाधिकार के नाते कई बार अन्य देश उसके घोषित उद्देश्य में भी वह सहयोग नहीं कर पाते, जो उसके और दूसरों के लिए जरूरी होता है। इसी तरह की निराशा हाल में भारतीय खुफिया अधिकारियों को उस समय हुई, जब उन्हें भारत पर आतंकी हमलों की साजिश में गिरफ्तार डेविड कोलमैन हेडली से बिना पूछ-ताछ किए वाशिंगटन से बैरंग लौटना पड़ा। भारतीय खुफिया अधिकारी एक हफ्ते तक वाशिंगटन में ही पड़े अमेरिकी खुफिया अधिकारियों से इजाजत मांगते रहे और आखिरकार उन्हें शिकागो जेल जाकर हेडली से पूछ-ताछ की हरी झंडी नहीं मिली। हालांकि खीझ कर वापस लौटे अधिकारी इसे ब्यूरोक्रेसी की अड़चनें बता रहे हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या बाद में उनके लिए अमेरिकी कानूनों में कोई रियायत दी जाएगी। अमेरिकी नागरिक कोलमैन हेडली और कनाडाई नागरिक तहावुर हुसैन राणा से भारतीय पूछ-ताछ इसलिए जरूरी है, क्योंकि पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई पर हुए आतंकी हमले से उनके तार जुड़े बताए जा रहे हैं। अभी उनकी योजना दिल्ली, देहरादून और मसूरी की खास जगहों पर हमला करने की थी। हेडली ने 2006 से 2009 के बीच दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, आगरा और लखनऊ का दौरा भी किया था।
 
भारतीय खुफिया अधिकारियों को मिली इस निराशा का मतलब यह है कि मुंबई हमलों के बाद भारत और अमेरिकी खुफिया एजंसियों के बीच तालमेल का जो दावा किया जा रहा था, उसमें अभी कसर है। इसे दूर करने का तरीका संबंधित देश के कानूनों और जांच की व्यावहारिक प्रणाली को ठीक से समझने और उसमें अपने लिए रास्ता बनाने का है। हमारी यह कमी वैश्विक अपराधों की छानबीन और अपराधियों के प्रत्यर्पण में सामने भी आई है। हाल में अमेरिका गए भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने वहां के प्रशासन से आतंकवाद पर चर्चा करने से पहले इस बात पर जबरदस्त अध्ययन किया कि वहां 9/11 के बाद फिर कोई आतंकी हमला क्यों नहीं हो सका। इसी समझ के चलते वे वहां अपनी छाप छोड़ आए थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस महीने होने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमेरिका दौरे में आतंकवाद की जांच में दोनों देशों के बीच सहयोग की बेहतर स्थितियां बनेंगी।

 

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