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एकनिष्ठ जुनून के बिना पत्रकारिता संभव नहीं: मृणाल

प्रसिद्ध पत्रकार व साहित्यकार मृणाल पांडे का मानना है कि एकनिष्ठ जुनून के बिना पत्रकारिता संभव नहीं है। पत्रकारिता में काफी रस है। अतः इसमें डूबना होगा। खबरों के चयन व उसके विश्लेषण में रस लेंगे तो बहुत ही आनन्द आएगा। पेशे से प्यार करना होगा। साथ ही गुणवत्ता भी बनाए रखनी होगी। पर घर-परिवार से दूर रहने की पीड़ा भी झेलनी होगी। हिन्दी पत्रकारिता का बाजार बहुत बड़ा है। यह बाजार की भाषा बन रही है।

वे बुधवार को स्पिक मैके की ओर से एडवांटेज मीडिया कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में पत्रकारिता के छात्रों से रू-ब-रू थीं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता शुरू में रजवाड़ों के लिए थी। फिर जनोन्मुखी हुई और अब इसका कारपोरेटीकरण हो गया है। इमरजेंसी के बाद सन् 1995 तक हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर रहा। कई अच्छे-अच्छे पत्रकार आए। अब अखबार प्रोडक्ट बन गया है और पाठक कंज्यूमर।

इस मौके पर छात्रों ने उनसे कई सवाल भी किए। छात्र अनुपम कुमार सिन्हा ने पूछा कि आज बाजारवाद किस कदर प्रभावित कर रहा है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यह बुरा नहीं है। हर व्यक्ति अपना स्वाभिमान व ऊर्जा लकर पत्रकारिता में आता है। आपको अपने निजत्व को बचाकर रखना होगा। अश्विनी कुमार ने जब कहा कि क्या पत्रकारिता लक्ष्मणरेखा पार कर रही है? तो उन्होंने कहा कि कभी-कभी उत्साह में ऐसा हो जाता है, पर इसकी जरूरत बनी रहती है। कहकशां ने पूछा कि मीडिया सेंसेटिव होने की जगह सेन्सेशनल क्यों हो जाता है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि नई संस्कृतियों की वजह से ऐसा हो रहा है। संजय के एक सवाल के जवाब में मृणालजी ने कहा कि पत्रकारिता ने उतनी तरक्की नहीं की है, जितनी समाज ने। इसलिए पत्रकारिता में अभी भी महिलाएं कम हैं।

स्पिकमैके बिहार की अध्यक्ष डॉ. मायाशंकर व एएमए के निदेशक खुर्शीद अहमद ने भी अपने विचार रखे। संचालन डॉ. ध्रुव कुमार ने किया। निदेशक रोहित सिंह ने मोमेंटो प्रदान किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य में ‘जी वाद’ को खत्म करने की वकालत की। दूसरी तरफ पटना कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज है आनंद। इस आनंद को ही रस कहते हैं। इसे पाने के लिए गंभीर, एकाग्र और दृढ़संकल्पित होना पड़ता है।

मृणाल पांडे ने कहा कि मगही पान से लेकर वैशाली की नगरवधू तक हर जगह मगध अंदर से रस से भींगा हुआ दिखता है, लेकिन इन दिनों यहां के लोगों में रस की कमी हो गई है। उन्होंने युवाओं से अपने अंदर उहापोह की स्थिति पैदा करने, निरंतर संवाद करने, सीखने और एकाग्रता से रस लेते हुए आगे बढ़ने का संदेश दिया। संपादकीय में कठिन भाषा के प्रयोग पर उन्होंने कहा कि एक संपादक होने के नाते मेरा उद्देश्य पाठकों को खबर देने के साथ-साथ उनकी शब्द संपदा को भी बढ़ाना है। व्याख्यान का संचालन ईला सिन्हा, स्वागत भाषण प्राचार्य लालकेश्वर सिंह और धन्यवाद ज्ञापन तरुण कुमार ने किया।

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