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कोर्ट की विधायी शक्ति संविधान पीठ के हवाले

कोर्ट की विधायी शक्ति संविधान पीठ के हवाले

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पांच सदस्यीय संविधान पीठ को इस बात पर विचार करने के लिए कहा कि क्या अदालतें कानून बना सकती हैं और उन्हें लागू कर सकती हैं। यह पूरी तरह विधायिका और कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में आता है।

गौरतलब है कि कानून बनाने और उनके कार्यान्वयन का अधिकार विधायिका और कार्यपालिका के पास है। न्यायमूर्ति मार्कन्डेय काटजू और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ ने, पूर्व में उच्चतम न्यायालय द्वारा देश भर में महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव कराने की खातिर दिशानिर्देश तय करने के बारे में दिए गए आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए यह मामला उठाया।

पीठ ने सालिसीटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम की यह दलील खारिज कर दी कि ऐसे आदेश सामाजिक जरूरतें पूरी करने के लिए दिए जाते हैं। सुब्रमण्यम उस मामले में सहायक वकील थे। पीठ ने कहा आज महंगाई बहुत बढ़ गई है और बेरोजगारी भी बहुत ज्यादा है। ये मुद्दे सामाजिक जरूरतों से जुड़े हैं। लेकिन क्या हम इस बारे में सरकार को निर्देश दे सकते हैं, हालांकि महंगाई से हम भी प्रभावित हैं।

उच्चतम न्यायालय ने लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव कराने के संबंध में दिशानिर्देश जारी किए थे। इन दिशानिर्देशों में, छात्रसंघ चुनाव प्रचार के लिए प्रत्याशियों द्वारा अंधाधुंध व्यय किए जाने पर रोक, आयु सीमा और आपराधिक तत्वों को चुनाव लड़ने से रोकना शामिल था।

पीठ ने कहा कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ द्वारा विचार करना जरूरी है क्योंकि इससे गंभीर संविधानिक महत्व के सवाल जुड़े हैं। संविधान पीठ जिन मुददों पर विचार करेगी, वे हैं- क्या उच्चतम न्यायालय का 22 सितंबर को लिंगदोह समिति की रिपोर्ट का कार्यान्वयन करने के लिए दिया गया अंतरिम आदेश वैध था। क्या यह न्यायिक विधेयक के दायरे में आता है। क्या न्यायपालिका कानून बना सकती है और अगर हां, तो इसकी सीमा कहां तक है। क्या न्यायपालिका ऐसे न्यायिक आदेश जारी करने के लिए सामाजिक समस्याओं का हवाला दे सकती है।

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