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भारत में महिला हॉकी उपेक्षा की शिकार: रानी

भारत में महिला हॉकी उपेक्षा की शिकार: रानी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर सुर्खियां बंटोरने वाली रानी रामफल को मलाल है कि भारत में महिला हॉकी टीम की उपलब्धियों को पर्याप्त तवज्जो नहीं मिलती और बड़े टूर्नामेंटों में पदक जीतने के बाद भी कोई पूछ परख नहीं की जाती।

इस साल जून में कजान में चैंपियंस चैलेंज टूर्नामेंट जीतने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम की एयरपोर्ट पर अगवानी के लिए भी कोई अधिकारी मौजूद नहीं था और खिलाड़ियों को खुद टैक्सी लेकर घर जाना पड़ा। वहीं पिछले सप्ताह बैंकाक में एशिया कप में रजत पदक लेकर लौटने के बाद अभी तक खिलाड़ियों के लिए किसी नकद पुरस्कार की घोषणा नहीं की गई है।

एशिया कप में आठ गोल दागने वाली हरियाणा की स्ट्राइकर रानी ने कहा कि हम जितनी मेहनत करते हैं, उतना सम्मान नहीं मिलता। कई बार तो लोगों को पता ही नहीं होता कि हम क्या जीतकर आए हैं। क्रिकेट और पुरूष हॉकी टीम के समान तवज्जो तो हमारे लिए सपने जैसी बात है।

कजान में सर्वाधिक गोल दागने वाली इस खिलाड़ी ने कहा कि चक दे इंडिया के बाद महिला हॉकी पर मीडिया और लोगों का ध्यान गया था, लेकिन अब फिर वही पुराना हाल है।

उन्होंने कहा कि मीडिया भी क्रिकेट के पीछे भागता है। महिला हॉकी खिलाड़ियों को कितने लोग जानते हैं। सुविधाएं कम होने के बावजूद हम विदेश में जीतते हैं लेकिन अपने ही घर में बेगानों सा व्यवहार किया जाता है। जब तक महिला हॉकी पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, हम बड़ी टीमों के बराबर नहीं पहुंच सकते।

रेहड़ी चालक की बेटी रानी की मुफलिसी की दास्तान को तो मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर छापा लेकिन मदद के लिए कोई हाथ आगे नहीं आया। रानी ने बताया कि दो साल में सिर्फ हरियाणा के मुख्यमंत्री से एक लाख रूपए नकद पुरस्कार मिला है। इसके अलावा कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। अभी नौकरी भी नहीं मिल सकती क्योंकि मैं सिर्फ सोलह साल की हूं। मेरी तरह ही कई खिलाड़ियों को मलाल होता है कि हम परिवार की आर्थिक मदद नहीं कर पा रहे हैं।
     
ग्यारहवीं की इस छात्रा ने कहा कि आज भी मेरे पिता रेहड़ी चलाते हैं और हमारे घर की छत आज भी बारिश में रिसती है। लेकिन मैं निराश नहीं हूं। मुझे यकीन है कि एक दिन समय बदलेगा और महिला हॉकी की स्थिति में भी सुधार होगा। मुझे उस समय का इंतजार है।
     
भारतीय महिला हॉकी की बदहाली का आलम यह है कि पिछले दो अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में खिलाड़ियों को दैनिक भत्ता नहीं मिला। इसके अलावा अधिकांश खिलाड़ियों को पुरानी किट के साथ ही खेलना पड़ा। खेल सामान बनाने वाली एक कंपनी ने किट प्रायोजन की इच्छा जताई थी, लेकिन हॉकी इंडिया ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

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