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बढ़ती हिंदी के नए दुश्मन

यह लेखक भावुक नहीं है, लेकिन राज ठाकरे के मनसे के चार विधायकों ने अबू आजमी की हिंदी में शपथ के समय जो गुंडागर्दी की है, उससे हर सजग हिंदी वाला क्षुब्ध हो सकता है और इस मानी में यह लेखक भी क्षुब्ध महसूस करता है। इस सात्विक क्षोभ में वह अकेला नहीं है। यद्यपि वह यह भी जानता है कि हिंदी को आखेट करने की तमाम घटनाओं में हिंदी के साहित्यकार शर्मनाक मौन साध लिया करते हैं।
   
अच्छी बात यह रही है कि हिंदी के नाम पर सीनातान कर एक व्यक्ति अबू आजमी खड़ा हो गया। और सारी जानलेवा धमकियों के बावजूद वह हिंदी में शपथ लेता है और इस तरह हिंदी के नए दुश्मनों को ललकारता है। वह रातों-रात हिंदी समाज का एक हीरो सा बन जाता है। उसकी यह भाषा वीरता तब और भी आकर्षक बन उठती है, जब हम देखते हैं कि चंद फासिस्टों के सामने हिंदी का झंडा बुलंद करने वाला एक मुसलमान है, जो हिंदी के लिए जान की बाजी लगा रहा है।

यह अबू की हिंदी की जाबांज प्रतीकात्मकता है, जिसमें राज ठाकरे के दुराभिमान को एक चोट जरूर लगी है। साफ-साफ कहें तो राजठाकरे का ऊंट हिंदी के पहाड़ के नीचे आया है और मीडिया ने भी इस ऊंट को उसकी औकात बताने की कोशिश की है। अंग्रेजी मीडिया जो हिंदी को लेकर कभी सदय नहीं रहा है, उसे भी हिंदी बोलने पर की गई एक विधायक की पिटाई अस्वीकृत किया है, उसकी निंदा की है।

यह महाराष्ट्र को, मराठी भाषा को, उसके इतिहास को फासिस्टी मोड़ देने की साज़िश है, इसीलिए मामला वोट भर का नहीं है। मराठी जन की चित्तवृत्ति को अपने ढंग से अनुदार बनाने का भी है। मामला इतना भर भी नहीं है। यह भाषाई दंगई और गुंडई की शुरुआत है। हिंदी के विरोध में अब तक दर्ज होने वाली ऐसी घटनाएं किसी एक भाषा की पहचान को किसी दूसरी मित्र भाषा के विरोध में एक हिंसक उन्माद का वातावरण बनाने की कोशिशें हैं। ऐसी घटनाएं भाषागत रार से ज्यादा भाषागत अस्मितावाद के जातीयतावादी सवालों की ओर इंगित करती हैं।

हिंदी मराठी के लिए कोई खतरा नहीं है, हां राजठाकरे को वह खतरा लगती है। दोनों मित्र भाषाएं हैं। सब भाषाओं की तरह हिंदी का जनक्षेत्र बढ़ा है। लेकिन हिंदी सबमें आगे-आगे रही है। हिंदी का नया विराट जनक्षेत्र पिछले कई दशकों में बनता गया है। भारत का भाषा सर्वेक्षण इस बढ़त को अच्छी तरह दर्शाता है। उदाहरण के लिए हिंदी भाषा सत्तर से अस्सी और अस्सी से नब्बे और नब्बे से दो हजार एक तक की दस वर्षीय दहाइयों में लगभग सात फीसदी के हिसाब से बढ़ी है, जबकि अन्य भाषाएं कम प्रतिशत वाली रही हैं।

हिंदी की यह बढ़त राजभाषा कानून के बाद की है, लेकिन राजभाषा कानून उसकी ‘वजह’ नहीं रहा, बल्कि यह बढ़त उससे बाहर निजी बिजनेस क्षेत्र यथा बाजार और मीडिया के समांतर बनी है। सर्वे का एक आंकडा यहां देना जरूरी है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल के सन् 2007 के प्रकाशित सर्वे में 2001 के आंकडे कहते हैं कि हिंदी को अपनी मातृभाषा मानने वाले की सकल संख्या कुल उपलब्ध आबादी में से 422048642 है जो कि 41.03 प्रतिशत बैठती है, जबकि मराठी के सकल मातृभाषियों की संख्या 71936894 यानी 6.99 प्रतिशत बैठती है।

इस आंकड़े की तुलना करके हम आसानी से समझ सकते हैं कि मराठी भाषा के लिए हिंदी से खतरा खाने वाले लोग भाषाओं के वस्तुगत बदलाव से बन रहे नए जनक्षेत्रों को नहीं जान पाते हैं। न बदलाव के कारणों को समझ पाते हैं और न क्षेत्रीय भाषाओं को हिंदी के साथ सहज संबंध में रहने देना चाहते हैं। वे हिंदी को बिग ब्रदर मानकर उससे डरते हैं और उसका एक मिथ खड़ा करते हैं और फिर उस पर हमला कर अपनी भाषा की संकुचित पहचान को और संकुचित करते जाते हैं और एक प्रकार के भाषागत अपार्थइड के हामी होना चाहते हैं।

उन्हें हिंदी को नीचे करने के लिए अंग्रेजी की शरण में जाना मंजूर होता है। उनका मन हिंदी से डरा हुआ पेरानायड मन है। इसीलिए हिंदी कई दिशाओं से अब भी अकारण आखेटित भाषा है। अकारण इसलिए कि हिंदी ने किसी अन्य भाषा को न दबाना चाहा है न हटाना चाहा है, बल्कि सच तो यह है कि हिंदी के समकालीन महामिक्स को संभव करने वाली जो सांस्कृतिक महामिक्सी हिंदी में अन्य भाषाओं को नित्य फेंट रही है, उसमें अंग्रेजी, उर्दू पंजाबी, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, तमिल, तेलुगू और पता नहीं किस -किस भाषा और बोली के शब्द मिल रहे हैं और हिंदी का जायका परिनिष्ठित साहित्यिक जायके से आगे बढ़कर एक ऐसा बन चला है, जिसमें सत्रह भाषाओं और बोलियों का रस एक साथ मिलता है।

अपने आजू-बाजू की ही नहीं दूर की भाषाओं के साथ साङोदारी हिंदी का नया तत्व है, जिसने हिंदी को आशातीत बढ़त दी है। इस बढ़त को हिंदी अपने उस स्वभाव से संभव कर सकी है, जो उसे आंरभ से एक मिश्रित भाषा के रूप में गढ़ता रहा है। हिंदी इस मानी में एक सतत अपभ्रंश है। अपभ्रंशिता होकर ही वह हिंदी है और सबकी प्रिय है, यहां तक कि राज ठाकरे के कथित मराठी मानूस की भी उतनी ही प्रिय है, जिसका उदाहरण बॉलीवुड है। बॉलीवुड दुनिया की नंबर दो की फिल्म इंडस्ट्री है और मुंबई ही वह महानगरी है, जिसमें राज ठाकरे अपनी ‘हिंदी हेट ब्रिगेड’ को सक्रिय कर रहे हैं।

राज ठाकरे शायद नहीं जानते कि बॉलीवुड की कीमत साठ हजार करोड़ से ज्यादा कूती जाती है, इसमें दस-पंद्रह लाख मराठी भाषी जन भी किसी न किसी रूप में काम करते हैं। उन्हें शायद इस अरबों-खरबों वाले बॉलीवुड में नित्य निर्मित होने वाले हिंदी मनोरंजन से कोई परेशानी नहीं है। यही राज ठाकरे का भाषावादी उचक्कापन है। बॉलीवुड से मुंबई की इकनॉमी का एक बड़ा हिस्सा चलाता है, सारा ग्लेमर चमक-दमक बॉलीवुड से ही है। हिंदी वालों ने इस पर कभी आपत्ति नहीं जताई कि हिंदी फिल्मों में मराठी भाषी तकनीशियन क्या कर रहे हैं। क्या राज ठाकरे बॉलीवुड को धमकाकर कहेंगे कि सिर्फ मराठी में पिक्चर बनाओ नहीं तो भाग जाओ। हिंदी अन्य तमाम भारतीय भाषाओं के उनमें रहनेवाले तमाम जनों को स्वजन-सुहृद मानती है। राज ठाकरे ने हिंदी को नहीं मारा है, उसने मराठी के गाल पर ही तमाचा मारा है, सोचना मराठी मानुस को है कि वह राज ठाकरे आदि से अपनी मराठी की सहजता भद्र उदार संस्कृति को कैसे बचाए। इसमें भी हिंदी ही उसकी सहयोगी होगी।

लेखक हिंदी आलोचक हैं

spachauri17@gmail.com

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